Madvi Hidma: 1967 में शुरू हुई सशस्त्र अब खत्म होने की कगार पर है. केंद्र सरकार ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा है. ऐसे में सरकार साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना कर नक्सलवाद को खत्म करने की कोशिश कर रही है. इसी क्रम में माड़वी हिड़मा 18 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश में अपनी पत्नी राजे उर्फ रज्जका और 4 अन्य साथियों के साथ सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया. इस बात को हफ्ता भर बीत गया लेकिन हर किसी की जुबां पर उसी का नाम है. इसी से समझ आता है कि वह संगठन के लिए कितना जरूरी थी. उसकी मौत के बाद नक्सलियों संगठनों की कमर टूट गई है. ऐसे में सरकार लक्ष्य को हासिल करते नजर आ रही है. ऐसे में अब सिर्फ इसके किस्से ही रह गए है. हिड़मा का एक ऐसा ही किस्सा बालाघाट से जुड़ा है. आइए जानते हैं क्या है वह किस्सा…
बालाघाट में भी सक्रिय रह चुका है हिड़मा
बालाघाट पर 1990 के दशक से ही नक्सलवाद का साया है. लेकिन करीब 35 साल बाद यहां एमएमसी जोन (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़) में भी नक्सली हथियार डालने के लिए समय की मांग कर रहे है. लेकिन उसी एमएमसी जोन में नक्सलवाद का अहम चेहरा माड़वी हिड़मा साल 2002 से लेकर 2004 तक एमएमसी जोन के बालाघाट में सक्रिय रहा. यहां उसे विलास के नाम से दलम में जाना जाता था.
छोटी उम्र में मिली थी बड़ी जिम्मेदारी
जब वह बालाघाट में सक्रिय था, तब उसकी उम्र करीब 21-22 साल की ही थी. लेकिन उसे संगठन ने बड़ी जिम्मेदारी दी थी. बालाघाट में उसकी मुख्य जिम्मेदारी नक्सली दलम में भर्ती और सर्वे कार्य की थी, कौन सा गांव नक्सलियों को समर्थन दे सकता है…कौन संगठन में शामिल हो सकता है…इलाके में किसकी क्या भूमिका है इन सभी की गुप्त जानकारी जुटाना उसी का काम था. यहां किसी बड़ी वारदात में शामिल न होने के बावजूद उसकी रणनीतिक भूमिका इतनी महत्वपूर्ण थी कि मध्यप्रदेश पुलिस ने उस समय उस पर 15 लाख रुपए का इनाम घोषित किया था.
हिड़मा ही नहीं ये बड़े नक्सली लीडर भी आ चुके हैं बालाघाट
हिड़मा उस दौर में अकेला नहीं था. उसी समय दो और बड़े माओवादी सोनू दादा और रुपेश भी बालाघाट में सक्रिय रहे. वह 2012 से लेकर 2015 तक यहां सक्रिय रहे. हिड़मा जहां भर्ती और सर्वे कर रहा था…वहीं सोनू दादा और रुपेश संगठन के विस्तार यानी दलम बढ़ाने की रणनीति संभाल रहे थे. तीनों की मौजूदगी ने उस समय बालाघाट को नक्सली गतिविधियों का महत्वपूर्ण ठिकाना बना दिया था.
10 साल से कोई नई भर्ती नहीं
एंटी नक्सल ऑपरेशन के एडिशनल एसपी आदर्श कांत शुक्ला बताते हैं कि ये नक्सल प्रभावित गांवों में जाते थे और भांपने की कोशिश करते थे कि संगठन को वहां से कितनी मदद मिल सकती है. यहां पर संगठन का क्या स्कोप है. इसका सर्वे करते और ऊपर इसकी रिपोर्ट करते थे. लेकिन एक समय के बाद नक्सल संगठन को सपोर्ट मिलना बंद हो गया. साथ ही वह नई भर्ती भी नहीं करा पाए. ऐसे में बालाघाट में संगठन लगातार कमजोर होता गया. बालाघाट के सिर्फ तीन लोग ही एक्टिव है, जिसमें संगीता, दीपक और संपत शामिल है.
अब टूटी नक्सलियों की कमर
बीते कुछ दिनों से सुरक्षाबलों की सक्रियता से नक्सलियों की कमर टूट चुकी है. पहले बसवाराजू मारा गया अब माड़वी हिड़मा. इसके अलावा सोनू दादा उर्फ भूपति ने 60 नक्सलियों के साथ सरेंडर साथ गढ़चिरौली में सरेंडर किया, तो उधर रुपेश ने 210 माओवादियों के साथ सरेंडर किया.
एंटी नक्सल ऑपरेशन के एडिशनल एसपी आदर्श कांत शुक्ला ने बताया कि हिडमा हथियार पसंद नक्सली था. उसकी मौत से मार्च 2026 की डेडलाइन को हासिल करने में मदद मिलेगी. वहीं, नक्सल मूवमेंट पर बड़ा डेंट भी बढ़ेगा. ये एक बड़ी सफलता है. ऐसे में बाकी सीसी मेंबर सोचने पर मजबूर होंगे कि उन्हें सरेंडर कर लेना चाहिए, नहीं तो किसी न किसी ऑपरेशन में उन्हें अपनी जान गवानी पड़ेगी.
सरेंडर करें पॉलिसी का लाभ लें
एंटी नक्सल ऑपरेशन के एडिशनल एसपी आदर्श कांत शुक्ला ने बताया कि हिडमा की मौत के बाद सरेंडर की संभावना बढ़ गई है. हाल ही में सुनीता ने सरेंडर किया था. ऐसे में उन्हें सरेंडर कर सरकारी की सरेंडर पॉलिसी का फायदा मिलेगा. वहीं, सरकार भी मुख्यधारा में लौटने में मदद करेगी.
.