₹20 की दिहाड़ी से शुरू किया सफर, आज खुद के होटल! रंजन ने संघर्ष से लिखी सफलता

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Success Story: गुमला के रंजन ने कभी 20 रुपए की दिहाड़ी पर जूठे बर्तन साफ कर सफर शुरू किया था. 20 साल के कड़े संघर्ष और सीखने के जज्बे ने उन्हें आज एक सफल होटल मालिक बना दिया है. फर्श से अर्श तक पहुंचने की यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए मिसाल है जो मेहनत के दम पर अपनी किस्मत बदलना चाहता है. पढ़ें रंजन के स्वावलंबन की पूरी रिपोर्ट.

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गुमला: अगर मन में कुछ पाने का जज्बा हो, तो तंगहाली भी रास्ता नहीं रोक सकती. गुमला के रंजन ने इस बात को सच कर दिखाया है. शहर के प्रसिद्ध बाबूलाल होटल में कभी 20 रुपये प्रति दिन पर बर्तन साफ करने वाला यह शख्स आज खुद का सफल होटल चला रहा है. 30 साल के लंबे संघर्ष के बाद रंजन ने न केवल गरीबी को मात दी. आज अपने दम पर घर, बच्चों की पढ़ाई और शादी की जिम्मेदारियां बखूबी पूरी कर चुके हैं. कभी शहर के एक पुराने होटल में बर्तन धोने वाले रंजन आज खुद के मालिक हैं.

20 रुपये की मजदूरी और 20 साल का संघर्ष
रंजन के सफर की शुरुआत गुमला के मशहूर बाबूलाल होटल से हुई थी. करीब 55-60 साल पहले जब उन्होंने काम शुरू किया तो उनकी दैनिक मजदूरी मात्र 20 रुपये थी. शुरुआत में उनका काम केवल जूठे बर्तन उठाना. उन्हें साफ करना था. रंजन बताते हैं कि उन्होंने लगभग 30 साल उस होटल को दिए. जिसमें से शुरुआती 20 साल उन्होंने सिर्फ बर्तन धोने का काम किया. लेकिन उनके भीतर कुछ सीखने का जज्बा था. बर्तन धोते-धोते उनकी नजरें वहां के कारीगरों के हाथों के हुनर पर टिकी रहती थीं.

बर्तन धोने वाले से हेड कारीगर तक का सफर
धीरे-धीरे रंजन ने पकवान बनाने की बारीकियों को समझना शुरू किया. उनकी लगन रंग लाई और वे उसी होटल के हेड मिस्त्री यानी मुख्य कारीगर बन गए. वहां बनने वाला हर व्यंजन उन्हीं की देखरेख में तैयार होने लगा. इस दौरान उन्होंने कई अन्य युवाओं को भी खाना बनाने की कला सिखाई और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया.

करमडीपा चौक पर अपनी पहचान
रंजन कहते हैं कि एक समय मन में ख्याल आया कि आखिर कब तक दूसरों के यहां काम करेंगे? बच्चों का भविष्य और अपना घर बनाने के लिए खुद का कुछ करना जरूरी था. इसी सोच के साथ उन्होंने गुमला के करमडीपा चौक पर अपना खुद का होटल शुरू किया. आज वे पिछले 30 सालों से सफलतापूर्वक अपना आउटलेट चला रहे हैं. इस सफर में उनकी पत्नी उनका पूरा सहयोग करती हैं. उनके होटल में समोसा, प्याजी, कचरी, जलेबी, पकौड़ी और मालपुआ जैसे पारंपरिक व्यंजनों की भारी मांग रहती है.

बच्चों की शादी से लेकर खुद के घर तक
आज रंजन एक सफल व्यक्ति हैं. होटल की कमाई से उन्होंने न केवल बच्चों को अच्छी शिक्षा दी, बल्कि उनकी शादियां भी धूमधाम से करवाईं और अपना खुद का घर भी बनाया. उनका होटल सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक ग्राहकों से गुलजार रहता है. रंजन की कहानी यह साबित करती है कि मेहनत और ईमानदारी से किया गया काम कभी निष्फल नहीं जाता.

About the Author

Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें

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