कभी 2-4 हजार मांगने पड़ते थे, खटारा बाइक थी सहारा, आज खड़ा किया ऐसा 200 करोड़ का बिजनेस

सीतामढ़ी. सीतामढ़ी के एक युवा ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से वह मुकाम हासिल किया है, जो आज के युवाओं के लिए एक मिसाल है. जहां एक तरफ लोग सरकारी नौकरी के पीछे भागते हैं, वहीं इस शख्स ने शून्य से शिखर तक का सफर तय कर खुद का साम्राज्य खड़ा किया है. यह कहानी है एक ऐसे राइस मिल व्यवसायी की, जिसने कभी ₹2,000 और ₹5,000 उधार लेकर अपने व्यवसाय की नींव रखी थी और आज करोड़ों का टर्नओवर संभाल रहे हैं. हम बात कर रहे हैं सीतामढ़ी जिले बोखरा के रहने वाले संजय कुमार की.

सिविल सर्विसेज छोड़ चुना उद्यमिता का रास्ता
व्यवसायी संजय कुमार का परिवार चाहता था कि वे सिविल सर्विसेज में जाकर एक प्रशासनिक अधिकारी बनें. घर का पूरा माहौल उन्हें पढ़ाई और सरकारी नौकरी की ओर धकेल रहा था, लेकिन उनके मन में कुछ अलग करने की इच्छा थी. वे अपने माता-पिता के करीब रहकर समाज और क्षेत्र के विकास में योगदान देना चाहते थे. इसी सोच के साथ उन्होंने राइस मिल उद्योग को चुना. शुरुआत में परिवार ने भी ज्यादा समर्थन नहीं दिया ताकि वे वापस पढ़ाई की ओर लौट सकें, लेकिन उनकी जिद ने आज उन्हें एक सफल उद्यमी बना दिया है.

मार्जिन मनी के लिए रिश्तेदारों से लिया उधार
संजय को व्यवसाय शुरू करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती पूंजी की थी. संजय बताते हैं कि उनके पास शुरुआती ‘मार्जिन मनी’ जमा करने तक के पैसे नहीं थे. उन्होंने हार नहीं मानी और अपने दोस्तों व रिश्तेदारों से 2,000 रुपये और 5,000 रुपये जैसी छोटी-छोटी रकम जोड़कर पूंजी इकट्ठा की. उनके माता-पिता ने जानबूझकर आर्थिक मदद नहीं की, क्योंकि वे चाहते थे कि उनका बेटा अपने बलबूते खड़ा होकर संघर्ष की भट्टी में तपकर कुंदन बने. आज वही संघर्ष उनकी मजबूती का आधार बना है.

खटारा बाइक से 200 करोड़ के टर्नओवर तक का सफर
शुरुआती दिनों में उनके पास काम संभालने के लिए मुंशी या स्टाफ नहीं था. वे खुद अपनी पुरानी ‘डिस्कवर’ बाइक पर एक भारी बैग टांगे, जिसमें ऑफिस के सारे कागजात होते थे, दिन भर में 40-50 किलोमीटर के चक्कर लगाते थे. सीतामढ़ी की सड़कों पर सुबह से लेकर रात के 12 बजे तक दौड़ना उनकी दिनचर्या थी. मेहनत का नतीजा यह है कि आज उनकी कंपनी का सर्विस टर्नओवर 100 से 200 करोड़ के बीच पहुंच गया है, जो मुख्य रूप से सरकारी धान की मिलिंग और चावल आपूर्ति से जुड़ा है.

रोजगार का सृजन: 10 मजदूरों से 70 तक का कुनबा
जब उन्होंने मिल शुरू की थी, तब केवल 10 से 15 मजदूर काम करते थे. आज उनके पास 65 से 70 लोगों का स्थायी स्टाफ है. इनमें 40 लोग बोरा लोडिंग और अनलोडिंग (पलदार) का काम करते हैं, जबकि बाकी मिलिंग, बॉयलर और ड्रायर की विशेष टीमों का हिस्सा हैं. एक समय खुद मुंशी का काम करने वाले इस संजय ने आज दर्जनों परिवारों को प्रत्यक्ष रोजगार देकर उनके घरों का चूल्हा जलाने में मदद की है.

सरकारी मॉडल और पारदर्शिता से मिली सफलता
व्यवसायी संजय ने बताते हैं कि उनका ज्यादातर काम सरकार के साथ है. सरकार उन्हें धान उपलब्ध कराती है और वे तैयार चावल वापस देते हैं. इस प्रक्रिया में घोटाले की कोई गुंजाइश नहीं रहती क्योंकि जितना धान मिलता है, उसी अनुपात में चावल देना होता है. हालांकि सरकारी मिलिंग चार्ज मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल मिलता है, लेकिन बड़े पैमाने पर काम होने के कारण यह एक सफल बिजनेस मॉडल बन गया है. वे आज करोड़ों रुपये के सरकारी धान को प्रोसेस कर अपनी क्षमता साबित कर रहे हैं.

जीरो से हीरो बनने की प्रेरणादायक मिसाल
आज इस व्यवसायी संजय को न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे जिले में सम्मान की नजर से देखा जाता है. जो कल तक एक पुरानी बाइक पर संघर्ष कर रहे थे, आज वे अन्य नए उद्यमियों को सलाह देते हैं कि कैसे ईमानदारी और कठिन परिश्रम से रास्ता बनाया जाता है. उनकी कहानी यह सिखाती है कि अगर आपके इरादे मजबूत हों, तो मार्जिन मनी की कमी या संसाधनों का अभाव आपकी सफलता में बाधा नहीं बन सकता.

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