कोई विसर्जन, तो कोई घर ले गया रथ! गणगौर की अनोखी परंपरा ने खींचा ध्यान

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Ground report gangaur visarjan : गणगौर के आखिरी दिन एक खास नजारा भी देखने को मिला. जहां कई श्रद्धालुओं ने परंपरा अनुसार माता का विसर्जन किया, वहीं कई मन्नतधारी परिवार माता को पानी पिलाकर वापस अपने घर ले गए. यह परंपरा हर साल देखने को मिलती है, जिसमें श्रद्धालु एक दिन और सेवा करने के बाद अगले दिन विसर्जन करते हैं. लेकिन का बाद एक ओर दिन कुछ लोग सेवा के लिए रथ वापस ले गए.

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खरगोन : मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल के सबसे बड़े लोकपर्व गणगौर का समापन सोमवार देर रात माता रूपी ज्वारों के विसर्जन के साथ हुआ. खरगोन की धार्मिक नगरी मंडलेश्वर के नर्मदा घाट पर देर रात तक हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी रही. घाटों पर ढोल, गीत और झालरिया के बीच श्रद्धालुओं ने नम आंखों से रनुबाई को विदाई दी. पूरा घाट भक्ति और भावनाओं से भरा नजर आया.

गणगौर के आखिरी दिन एक खास नजारा भी देखने को मिला. जहां कई श्रद्धालुओं ने परंपरा अनुसार माता का विसर्जन किया, वहीं कई मन्नतधारी परिवार माता को पानी पिलाकर वापस अपने घर ले गए. यह परंपरा हर साल देखने को मिलती है, जिसमें श्रद्धालु एक दिन और सेवा करने के बाद अगले दिन विसर्जन करते हैं. लेकिन का बाद एक ओर दिन कुछ लोग सेवा के लिए रथ वापस ले गए. घाट पर यह दृश्य लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा.

तीन दिन का गणगौर पर्व
निमाड़ क्षेत्र में गणगौर पर्व की शुरुआत चैत्र नवरात्रि की तृतीया से होती है. इसी दिन माता की बाड़ी खुलती है और श्रद्धालु सजे धजे रथ लेकर ज्वारे लेने पहुंचते हैं. इसके बाद तीन दिन तक घर घर में झालरिया गाकर माता की सेवा की जाती है और पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल रहता है. इस साल भी शनिवार से शुरू हुआ यह पर्व रविवार को पानी पिलाने की परंपरा के साथ आगे बढ़ा. श्रद्धालु रथ लेकर नर्मदा घाट पहुंचे और माता को पानी पिलाया. यहां से कई परिवार माता को बोड़ाकर वापस घर ले गए. सोमवार रात को जिलेभर में विसर्जन का सिलसिला देर रात से लेकर सुबह तक चलता रहा.

सामाजिक भाईचारे का अनोखा पर्व
गणगौर पर्व को निमाड़ में सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाता है. इस दिन जात पात का भेद मिट जाता है और सभी समाज के लोग एक साथ घाटों पर पहुंचते हैं. मंडलेश्वर, महेश्वर सहित जिले के कई घाटों पर ऐसा ही दृश्य देखने को मिला. घाटों पर ऐसा माहौल बना रहा जैसे किसी बड़े मेले का आयोजन हो. अलग अलग समाज के लोग अपने समय अनुसार विसर्जन करते नजर आए, लेकिन पूरे समय एक दूसरे के साथ सहयोग और भाईचारा दिखाई दिया. हर कोई इस पर्व को मिलजुलकर मनाता नजर आया.

निमाड़ी गीतों की गूंज पर झूमते रहे श्रद्धालु
विसर्जन से पहले घाटों पर निमाड़ी गीतों की खास गूंज सुनाई दी. नगर परिषद द्वारा लगाए गए म्यूजिक सिस्टम पर पारंपरिक गीत बजते रहे. महिलाएं सिर पर रथ रखकर पूरे उत्साह के साथ नाचती नजर आईं. घाटों पर देर रात तक उत्सव जैसा माहौल बना रहा. पुरुष भी पीछे नहीं रहे. उन्होंने धनियर राजा के रथ उठाकर पूरे जोश के साथ नृत्य किया. जैसे जैसे विसर्जन का समय करीब आया वैसे वैसे माहौल भावुक होता गया. कई श्रद्धालु रनुबाई को गले लगाकर विदाई देते नजर आए.

झालरिया और पारंपरिक प्रसादी की रही खास
गणगौर पर्व की एक खास बात यह भी रही कि यहां पूजा वैदिक मंत्रों की जगह लोक परंपरा के अनुसार की गई. श्रद्धालुओं ने निमाड़ी भाषा में झालरिया गाकर माता की आराधना की. यह परंपरा आज भी पूरे निमाड़ क्षेत्र की पहचान बनी हुई है. वहीं प्रसाद के रूप में मक्का की धानी, परमल और भुने चने बड़ी मात्रा में श्रद्धालुओं के बीच बांटे गए. घाटों से लेकर शहर की गलियों तक पूरे क्षेत्र में गणगौर पर्व का उत्साह देर रात तक देखने को मिला.

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Amit Singh

7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें

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