शरीर के इन हिस्सों पर निकल आते हैं छोटे-छोटे दाने, कहीं हर्पीज वायरस का इंफेक्शन तो नहीं?

Tips To Control HSV Infection: कई बार लोगों के चेहरे, होंठ, आंख और शरीर के अन्य हिस्सों पर छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं, जो कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं. अक्सर लोग इन्हें एलर्जी मान लेते हैं, लेकिन यह हर्पीज वायरस के संक्रमण का संकेत हो सकता है. यह वायरस स्किन पर छोटे-छोटे लाल दानों की वजह बनता है और ये दाने फूटने पर पानी जैसा फ्लूड भी निकलता है. हर्पीज वायरस बहुत कॉमन है और बड़ी संख्या में लोग इससे प्रभावित हैं. हालांकि इसके बावजूद अधिकतर लोग इसके बारे में जानते ही नहीं हैं. आज आपको इस वायरस के लक्षण, कारण और इलाज के बारे में बता रहे हैं.

अमेरिका की क्लीवलैंड क्लीनिक की रिपोर्ट के मुताबिक हर्पीज एक वायरल बीमारी है, जो हर्पीज सिम्प्लेक्स वायरस (HSV) के कारण होती है. इस संक्रमण की सबसे बड़ी पहचान स्किन पर छोटे-छोटे पानी से भरे दानों या छालों का निकलना है. इनमें अक्सर तेज जलन, खुजली और दर्द महसूस होता है. दुनियाभर में लाखों लोग इस वायरस से प्रभावित हैं, लेकिन इसके बारे में जागरुकता की कमी है. इसकी वजह से लोग सही समय पर इसका इलाज नहीं करा पाते हैं. हर्पीज न केवल स्किन को प्रभावित करता है, बल्कि यह शरीर के नर्वस सिस्टम में भी छिपा रह सकता है, जिससे इसके बार-बार उभरने का खतरा बना रहता है.

हर्पीज मुख्य रूप से 2 प्रकार का होता है. पहला HSV-1, जिसे ओरल हर्पीज कहा जाता है. यह अक्सर मुंह के आसपास, होठों पर या चेहरे पर ठंडे घाव (Cold Sores) के रूप में दिखाई देता है. दूसरा HSV-2, जिसे जेनाइटल हर्पीज कहा जाता है. यह एक सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन (STI) है और जननांगों के आसपास दानों का कारण बनता है. लक्षणों की बात करें तो दाने निकलने से पहले उस जगह पर झनझनाहट या खुजली महसूस होती है, जिसके बाद लाल रंग के गुच्छेदार छाले बन जाते हैं. कई बार इसके साथ बुखार, बदन दर्द और लिम्फ नोड्स में सूजन भी आ सकती है.

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यह वायरस सीधे संपर्क से फैलता है. अगर आप संक्रमित व्यक्ति के छालों, लार या शरीर के अन्य फ्लूड के संपर्क में आते हैं, तो यह आपके शरीर में भी घुस सकता है. किस करने, जूठा खाना खाने या संक्रमित व्यक्ति का तौलिए और लिपस्टिक जैसी चीजें शेयर करने से यह वायरस फैल सकता है. जेनाइटल हर्पीज मुख्य रूप से असुरक्षित यौन संबंधों के माध्यम से फैलता है. गौर करने वाली बात यह है कि कभी-कभी व्यक्ति में कोई लक्षण नहीं दिखते, फिर भी वह वायरस का वाहक हो सकता है और दूसरों को संक्रमित कर सकता है. ऐसे में इससे बचने के लिए सावधानी बरतना बेहद जरूरी है.

वैज्ञानिकों की मानें तो हर्पीज वायरस एक बार शरीर में प्रवेश करने के बाद कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता है. यह रीढ़ की हड्डी के पास स्थित नर्व सेल्स में निष्क्रिय अवस्था में पड़ा रहता है. जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी कमजोर होती है या व्यक्ति अत्यधिक तनाव, थकान या किसी अन्य बीमारी से गुजरता है, तो यह वायरस फिर से सक्रिय होकर त्वचा पर दोबारा दाने पैदा कर देता है. इसे आउटब्रेक कहा जाता है.

हर्पीज का पता आमतौर पर डॉक्टर दानों को देखकर ही लगा लेते हैं, लेकिन कंफर्म करने के लिए छालों के फ्लूड का लैब टेस्ट (PCR) या ब्लड टेस्ट किया जा सकता है. वर्तमान में हर्पीज का कोई परमानेंट इलाज नहीं है, लेकिन एंटी-वायरल दवाएं जैसे एसाइक्लोविर या वैलासाइक्लोविर इस वायरस के इंफेक्शन की सीवियरिटी को कम करने में बहुत असरदार हैं. ये दवाएं वायरस के फैलने की गति को धीमा कर देती हैं और दर्द में राहत दिलाती हैं. अगर इलाज शुरुआती लक्षणों के 24 से 48 घंटों के भीतर शुरू हो जाए, तो घाव जल्दी ठीक हो सकते हैं.

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