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Benefits of Pippali (Long Pepper) in Ayurveda: पिप्पली आयुर्वेद की एक प्रमुख औषधि है जो श्वसन और पाचन तंत्र के लिए बेहद फायदेमंद है. इसकी गर्म तासीर कफ और जुकाम में राहत देती है, लेकिन इसका संतुलित उपयोग ही सुरक्षित माना जाता है.
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में पिप्पली को एक अत्यंत प्रभावशाली और महत्वपूर्ण औषधि के रूप में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है. आकार में छोटी दिखने वाली यह जड़ी-बूटी अपने भीतर औषधीय गुणों का विशाल खजाना समेटे हुए है, जिसका विस्तृत उल्लेख हमारे प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों में भी मिलता है. विशेष रूप से श्वसन तंत्र से जुड़ी समस्याओं जैसे कि पुरानी खांसी, सर्दी-जुकाम और कफ दोष को दूर करने के लिए इसे रामबाण माना जाता है. आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, पिप्पली की तासीर उष्ण होती है, जो शरीर के भीतर ऊष्मा पैदा कर मेटाबॉलिज्म और पाचन को सुधारने में सहायक होती है. यदि इसका सेवन उचित परामर्श और सही मात्रा में किया जाए, तो यह न केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है, बल्कि समग्र स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है.

पिप्पली की खेती एक बेल के रूप में की जाती है, जो मुख्य रूप से बड़े पेड़ों की छायादार जगहों पर बेहतर तरीके से पनपती है. इसे लगाने के लिए बरसात का मौसम सबसे उपयुक्त माना जाता है और एक बार लगाने के बाद इसका पौधा लगभग 4 से 5 वर्षों तक सक्रिय जीवनकाल रखता है. स्वाद और प्रकृति के मामले में पिप्पली काफी हद तक काली मिर्च जैसी ही तीखी होती है. हालांकि, इसका फल खसखस के दाने जितना सूक्ष्म होता है, लेकिन छोटे आकार के बावजूद इसके स्वास्थ्यवर्धक गुण और प्रभाव आयुर्वेद में अत्यंत शक्तिशाली माने जाते हैं.

आयुर्वेद में पिप्पली के संपूर्ण पौधे को बहुमूल्य माना गया है, जिसमें इसके फल, पत्तियां और तने – इन तीनों ही अंगों का उपयोग विशिष्ट औषधियों के निर्माण में किया जाता है. आयुर्वेद के अलावा, कई क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट तीक्ष्णता के कारण इसे एक मुख्य मसाले के तौर पर भी रसोई में स्थान प्राप्त है. स्वास्थ्य लाभों के दृष्टिकोण से पिप्पली विशेष रूप से श्वसन तंत्र के लिए अत्यंत लाभकारी मानी गई है, जो दमा, ब्रोंकाइटिस और सांस से जुड़ी अन्य जटिल समस्याओं में राहत प्रदान करने में सहायक सिद्ध होती है.
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स्वास्थ्य लाभों के दृष्टिकोण से पिप्पली को श्वसन तंत्र के लिए एक शक्तिशाली औषधि माना गया है. आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार, इसमें मौजूद गुण शरीर से जमे हुए कफ को पिघलाकर बाहर निकालने में अत्यंत प्रभावी होते हैं, जिससे अस्थमा, पुरानी खांसी, जुकाम और ब्रोंकाइटिस जैसी श्वसन संबंधी समस्याओं में त्वरित राहत मिल सकती है. इसके अतिरिक्त, कई आयुर्वेद विशेषज्ञों का मानना है कि पिप्पली का नियमित और सही मात्रा में सेवन फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढ़ाता है, उन्हें मजबूती प्रदान करता है और पूरे श्वसन तंत्र को सुचारू रूप से कार्य करने में सहायक होता है.

पाचन तंत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए भी आयुर्वेद में पिप्पली को अत्यंत लाभकारी बताया गया है. मुख्य रूप से अपच, पेट में गैस, एसिडिटी और कब्ज जैसी सामान्य से लेकर जटिल समस्याओं के समाधान में इसका उपयोग प्रभावी सिद्ध होता है. आयुर्वेद के अनुसार, यह शरीर की ‘पाचन अग्नि’ को प्रज्वलित कर भोजन के बेहतर अवशोषण में मदद करती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को भी मज़बूत बनाती है. इसके अतिरिक्त, पिप्पली के सूजनरोधी गुणों के कारण जोड़ों के दर्द और सूजन से राहत पाने के लिए भी प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके उपयोग की विस्तृत चर्चा मिलती है.

पिप्पली का सेवन व्यक्ति की आवश्यकता और सुविधा के अनुसार अलग-अलग तरीकों से किया जाता है. सामान्य तौर पर, इसके चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर या गुनगुने पानी के साथ लेना सबसे प्रचलित तरीका है. इसके अलावा, औषधीय प्रभाव को बढ़ाने के लिए कई लोग इसे तुलसी, अदरक और दालचीनी के साथ पानी में उबालकर काढ़े के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं, जो विशेष रूप से मौसमी बीमारियों में फायदेमंद होता है. हालांकि, इसकी तासीर गर्म होने के कारण सेवन के दौरान इसकी मात्रा का सही संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी माना गया है.

पिप्पली का अत्यधिक मात्रा में सेवन शरीर के भीतर पित्त और गर्मी को बढ़ा सकता है, जो पाचन में जलन या अन्य शारीरिक असुविधाओं का कारण बन सकता है. विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों और किसी गंभीर पुरानी बीमारी से जूझ रहे व्यक्तियों को इसके सेवन से पहले विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लेनी चाहिए. हालांकि आयुर्वेदिक औषधियां अपने प्राकृतिक गुणों के कारण अत्यंत लाभकारी होती हैं, लेकिन उनका सही मार्गदर्शन में संतुलित और नियंत्रित उपयोग ही स्वास्थ्य के लिए पूर्णतः सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है.