शिवपुरी. कभी हाथ में बंदूक थी, सीने पर देश का फर्ज और आंखों में दुश्मन से टकराने का जज्बा और आज वही शख्स भगवा वस्त्रों में दुनिया की हर चाहत छोड़कर भगवान की शरण में है. यह कहानी है मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के उस पूर्व सैनिक की, जिसने पहले सीमा पर रहकर देश की रक्षा की और फिर सब कुछ त्यागकर संन्यास का रास्ता चुन लिया. भारतीय सेना में 21 साल तक सेवा देने वाले मंगल भारती आज नागा साधु हैं. उनकी जिंदगी की यह यात्रा न सिर्फ चौंकाती है बल्कि सोचने पर भी मजबूर करती है कि इंसान का रास्ता कब और कैसे बदल जाता है, कुछ पता नहीं चलता. यह कहानी है पूर्व सैनिक मंगल भारती की. पहले उन्होंने भारतीय सेना में रहकर देश की सीमाओं की रक्षा की और बाद में सब कुछ छोड़कर संन्यास का रास्ता अपना लिया. आज वह नागा साधु के रूप में जीवन जी रहे हैं और युवाओं को देशभक्ति और त्याग का संदेश दे रहे हैं.
मंगल भारती लोकल 18 को बताते हैं कि संतों की संगत और उनके विचारों से वह काफी प्रभावित हुए. तभी उन्होंने तय कर लिया था कि सेना से रिटायर होने के बाद वह संन्यास ले लेंगे. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपना फैसला पूरा किया और सब कुछ छोड़कर नागा साधु बन गए. वह कहते हैं कि अब उन्होंने मोह-माया त्याग दी है और संन्यास का जीवन अपना लिया है. उनके मुताबिक, उन्होंने जिंदगी में जो रास्ता चुना है, उससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता. आज वह शिवपुरी जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर जगन्नाथ धाम सुरवाया गढ़ी पर रहते हैं. वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के मकरंदपुर गांव के रहने वाले हैं. साधु बनने के बाद उनका जीवन पूरी तरह सादगी, तपस्या और सेवा में बीत रहा है.
चलाते थे थ्री नॉट थ्री राइफल
वह आज भी अपने सेना के दिनों को याद करते हैं. उन्होंने बताया कि उस समय वह थ्री नॉट थ्री राइफल चलाते थे, जिसकी लंबाई करीब 44.5 इंच होती थी और मारक क्षमता लगभग दो किलोमीटर तक थी. उनका कहना है कि अगर उस दौर में आज जैसे आधुनिक हथियार होते, तो भारत और भी मजबूत स्थिति में होता. मंगल भारती की कहानी यह बताती है कि देश की सेवा और संन्यास दोनों ही बड़े काम हैं, बस रास्ते अलग-अलग हैं.
गौरतलब है कि भारत ने तब सीमित संसाधनों के बावजूद साहस और ताकत का परिचय दिया था. 1962 में चीन के साथ युद्ध हुआ, जिसमें भारतीय सैनिकों ने मुश्किल हालात में भी बहादुरी दिखाई. इसके बाद 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ. इस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया. जब भारत की जवाबी कार्रवाई तेज हुई, तो पाकिस्तान के लिए लाहौर बचाना मुश्किल हो गया था. बाद में संयुक्त राष्ट्र के दखल से 23 सितंबर 1965 को युद्ध रोक दिया गया. अगर युद्ध नहीं रुकता, तो हालात कुछ और होते.
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