ब्रह्मांड की सबसे अंधेरी जगह कौन सी है? इस नए खुलासे से वैज्ञानिक भी हैरान

रात का आसमान देखते ही सबसे पहला खयाल आता है, अंतरिक्ष तो पूरा काला है. लेकिन क्या सच में कुछ हिस्से बाकी जगहों से ज्यादा अंधेरे होते हैं? वैज्ञानिक कहते हैं कि जवाब इतना सीधा नहीं है. अंधेरा कई तरह से मापा जा सकता है और ये बात भी मायने रखती है कि आप किस किस्म की रोशनी देख रहे हैं.

ब्रह्मांड पूरी तरह काला क्यों नहीं होता
वैज्ञानिक बताते हैं कि अंतरिक्ष में बहुत ज्यादा कॉस्मिक धूल मौजूद है. ये धूल दूर दराज के तारो की रोशनी को बिखेर देती है. इसी वजह से स्पेस में हल्की चमक बनी रहती है, जो हमारी आंखो को दिखाई नहीं देती लेकिन मौजूद रहती है.

दिलचस्प बात ये है कि पूरे ब्रह्मांड का औसत रंग एकदम काला नहीं बल्कि “कॉस्मिक लाटे” जैसा हल्का सफेद सा माना जाता है. यानी, अंधेरा उतना परमानेंट नहीं है जितना हमें रात के आसमान से लगता है.

अंधेरा किसे कहते हैं, ये भी एक सवाल
वैज्ञानिकों के मुताबिक अंधेरा इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप सिर्फ दिखाई देने वाली रोशनी की बात कर रहे हैं या पूरे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम की.

क्योंकि अगर बाकी तरंगो जैसे गामा रे या अल्ट्रावायलेट को देखें, तो स्पेस काफी चमकदार माना जाएगा. लेकिन सिर्फ आंख से दिखने वाली रोशनी की बात करें, तो अंतरिक्ष में कई जगहें वाकई बहुत अंधेरी हैं.

कुछ खगोलीय पिंड खुद ही रोशनी सोख लेते हैं
अंधेरा सिर्फ रोशनी की कमी से नहीं होता. कई बार कोई सतह खुद रोशनी को सोख लेती है, जिससे वह बेहद काली दिखती है. इसे अल्बीडो कहा जाता हैयानि कोई सतह कितनी रोशनी वापस लौटाती है.

उदाहरण के लिए कोयला सिर्फ 4 प्रतिशत रोशनी वापस भेजता है, जबकि एक साफ शीशा 100 प्रतिशत तक लौटा सकता है.

सौर मंडल की सबसे काली जगह: बोरेल्ली धूमकेतु
धूमकेतु बोरेल्ली, जिसे 19P/Borrelly भी कहा जाता है, सौर मंडल के सबसे अंधेरे पिंडो में शामिल है. करीब 8 किलोमीटर लंबा ये धूमकेतु खबरों में इसलिए आया था क्योंकि ये सूरज की रोशनी का 3 प्रतिशत से भी कम हिस्सा वापस भेजता है. 2001 में ली गई तस्वीरों के बाद वैज्ञानिकों ने इसे स्पेस की “ब्लैक स्पॉट” कैटेगरी में रखा था.

ब्रह्मांड का सबसे अंधेरा ग्रह: TrES 2B
हमारा सौर मंडल छोड़ दें, तो अब तक ज्ञात सबसे काला ग्रह TrES 2B है. ये ग्रह तो रोशनी को एकदम निगल जाता है. इसकी सतह सिर्फ 1 प्रतिशत से भी कम रोशनी लौटाती है.

वैज्ञानिक मानते हैं कि इसके वातावरण में सोडियम वेपर और टाइटेनियम ऑक्साइड जैसी गैसें मौजूद हैं, जो रोशनी को बाहर निकलने ही नहीं देतीं. तुलना के लिए, हमारी धरती 30 प्रतिशत रोशनी वापस भेज देती है.

ब्लैक होल बाहर से काला, अंदर से बेहद चमकीला
ब्लैक होल का नाम आते ही दिमाग में एक ऐसी काली सुरंग की तस्वीर बनती है जहां कोई रोशनी नहीं होती. लेकिन वैज्ञानिक बताते हैं कि ये कहानी आधी ही सच है.

ब्लैक होल के बाहर का हिस्सा बेहद अंधेरा दिखता है क्योंकि वहां जाने वाली रोशनी कभी लौटकर नहीं आती. लेकिन अंदर का माहौल अलग होता है. वहां रोशनी मौजूद रहती है, बस वो फंस जाती है और बाहर नहीं जा पाती. कुछ जगहें इसलिए अंधेरी हैं क्योंकि वहां सूर्य की किरणें कभी पहुंचती ही नहीं अंतरिक्ष में कई ऐसे स्थान हैं, जहां सूरज की रोशनी उम्र भर नहीं पहुंचती.

जैसे चांद के ध्रुवों पर मौजूद कुछ क्रेटर. ये गड्ढे हमेशा छाया में रहते हैं. वैज्ञानिक इन्हे “परमानेंट शैडो” वाले क्रेटर कहते हैं. यहां का तापमान भी बेहद कम रहता है और रोशनी का नामोनिशान नहीं मिलता.

प्लूटो के कई क्रेटर भी इसी वजह से हमेशा अंधेरे में डूबे रहते हैं. इसकी दूरी सूरज से इतनी ज्यादा है कि रोशनी वहां बहुत मुश्किल से पहुँचती है.

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