नई दिल्ली: ईरान और उसके आसपास चल रहे युद्ध ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से वापसी का रास्ता धुंधला नजर आता है. पिछले एक साल में अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर दो बड़े हमले किए. इन हमलों का मुख्य मकसद ईरान की परमाणु क्षमता को खत्म करना था, जिसे वाशिंगटन और यरूशलेम अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं. ईरान में पिछले पांच हफ्तों से सैन्य अभियान जारी है और फिलहाल इसके रुकने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं. जानकारों का मानना है कि इस जंग ने दुनिया भर में परमाणु हथियारों की होड़ के उस जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है, जिसे दशकों तक काबू में रखने की कोशिश की गई थी. ईरान में शासन बदलने और उसके परमाणु कार्यक्रम को जमींदोज करने की जिद अब उल्टी पड़ती दिख रही है. यूरोप से लेकर पूर्वी एशिया तक के देश अपनी परमाणु नीति पर दोबारा विचार करने को मजबूर हैं.
कई देश अब इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या उन्हें अपने शक्तिशाली सहयोगियों पर आंख मूंदकर भरोसा करना चाहिए? ट्रंप प्रशासन की अनिश्चितता और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच, अब अपनी संप्रभुता बचाने के लिए खुद के परमाणु हथियार बनाने का विकल्प सबसे ऊपर आ गया है. यह शीत युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था से एक बहुत बड़ा भटकाव है.
क्या परमाणु छतरी के नीचे सुरक्षित महसूस करने वाले देश अब खुद का बम बनाएंगे?
एक वक्त था जब कई देश अमेरिका की परमाणु छतरी (Nuclear Umbrella) के नीचे खुद को महफूज मानते थे. लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है.
- यूरोप में जर्मनी और पोलैंड जैसे देश अब फ्रांस के उस प्रस्ताव पर गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं, जिसमें यूरोपीय परमाणु गारंटी की बात कही गई है. उन्हें डर है कि अमेरिका किसी भी वक्त अपने हाथ खींच सकता है. वहीं, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में जापान और दक्षिण कोरिया की चिंताएं भी चरम पर हैं.
- सबसे हैरान करने वाली बात जापान को लेकर है. दुनिया का इकलौता देश जिस पर परमाणु बम गिराए गए, वह आज अपनी शांतिवादी नीति को किनारे रखकर खुद के परमाणु हथियारों के बारे में सोच रहा है. चीन और रूस जिस तेजी से अपने शस्त्रागार का विस्तार कर रहे हैं, उसने जापान जैसे देशों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है.
- खुद अमेरिका ने भी संकेत दिए हैं कि वह 33 साल के अंतराल के बाद परमाणु परीक्षण फिर से शुरू कर सकता है. राष्ट्रपति ट्रंप ने पेंटागन को आदेश दिया है कि वह रूस और चीन की बराबरी करने के लिए परमाणु परीक्षणों की तैयारी करे. रूस की पोसीडॉन अंडरवाटर ड्रोन और ब्यूरेवेस्टनिक क्रूज मिसाइल जैसी तकनीक ने अमेरिका की नींद उड़ा दी है.
ईरान युद्ध ने परमाणु अप्रसार संधि पर से भरोसा खत्म कर दिया?
ईरान पर अमेरिका के हमलों ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों की साख को भारी नुकसान पहुंचाया है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ एक नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को आगे बढ़ाया है. इसमें सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) की अनुमति मिलने की संभावना खुली रखी गई है. सऊदी अधिकारियों ने पहले ही साफ कर दिया था कि अगर ईरान बम बनाता है, तो वे भी पीछे नहीं रहेंगे.
नाटो की सुस्त प्रतिक्रिया और सहयोगियों पर घटते भरोसे ने इन देशों को अपनी राह चुनने पर मजबूर कर दिया है. ट्रंप के कार्यकाल में नाटो की प्रासंगिकता पर उठे सवालों ने भी इस माहौल को और बिगाड़ा है.
न्यूक्लियर रेस 2.0: ट्रंप की नीतियों और ईरान पर हमलों ने दुनिया को तबाही के मुहाने पर लाकर खड़ा किया! (AI Photo)
क्या परमाणु हथियार होना ही हमले से बचने की सबसे बड़ी गारंटी है? 5 प्वॉइंट में समझें
- ईरान के खिलाफ मौजूदा सैन्य कार्रवाई ने दुनिया को एक कड़ा सबक दिया है. लीबिया और यूक्रेन जैसे देशों का उदाहरण सबके सामने है, जिन्होंने अपने परमाणु विकल्प छोड़ दिए और बाद में उन्हें बाहरी हमलों का सामना करना पड़ा.
- विशेषज्ञ मानते हैं कि परमाणु हथियार होने का मतलब यह नहीं है कि जंग कभी नहीं होगी, लेकिन यह दुश्मन के लिए हमले की कीमत को बहुत ज्यादा बढ़ा देता है.
- इसे आप घर के बाहर बंधे एक खूंखार शिकारी कुत्ते (Doberman) की तरह समझ सकते हैं. हो सकता है कि उसे कभी खुला न छोड़ा जाए, लेकिन उसकी मौजूदगी ही घुसपैठियों को डराने के लिए काफी होती है.
- उत्तर कोरिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद, सिर्फ अपने परमाणु भंडार के दम पर उसने बाहरी हस्तक्षेप को रोक रखा है. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के महानिदेशक राफेल मारियानो ग्रॉसी ने इस प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई है.
- उन्होंने चेतावनी दी है कि ज्यादा देशों के पास परमाणु हथियार होने से दुनिया सुरक्षित नहीं, बल्कि और भी खतरनाक हो जाएगी. लेकिन हकीकत यह है कि अब ‘डूम्सडे क्लॉक’ (तबाही की घड़ी) आधी रात से सिर्फ 85 सेकंड दूर है, जो मानवीय आपदा के सबसे करीब होने का संकेत है.
यूरोप अब अमेरिका के बजाय फ्रांस की ओर क्यों देख रहा है?
यूरोप में सुरक्षा की कमान अब बदलती दिख रही है. जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ परमाणु सहयोग पर गोपनीय चर्चा शुरू कर दी है. फ्रांस के राष्ट्रपति का मानना है कि ‘स्वतंत्र रहने के लिए शक्तिशाली होना और डर पैदा करना जरूरी है.’
पोलैंड भी अब फ्रांस के साथ करीबी संबंध बनाना चाहता है ताकि वह किसी भी असुरक्षित क्षेत्र (Zone of Insecurity) का हिस्सा न रहे. ब्रिटेन में भी अब अपनी मिसाइल निर्माण क्षमता को पुनर्जीवित करने की मांग उठ रही है.
विशेषज्ञों का कहना है कि आज का माहौल परमाणु हथियारों के पक्ष में वैसा ही है जैसा पहले कभी नहीं था. अगर देशों को लगता है कि सामूहिक सुरक्षा का वादा सिर्फ एक दिखावा है, तो वे निश्चित रूप से सबसे बड़े हथियार (The Big One) की ओर ही देखेंगे.
दक्षिण कोरिया में तो 75% से ज्यादा लोग अब खुद का परमाणु बम बनाने के पक्ष में हैं. अगर दक्षिण कोरिया या जापान जैसे देश इस रास्ते पर चलते हैं, तो यह एक ऐसी चेन रिएक्शन शुरू कर देगा जिसे रोकना किसी के बस में नहीं होगा.
दुनिया में इस वक्त किसके पास कितने परमाणु हथियार और मिसाइलें हैं?
2025 की शुरुआत तक दुनिया के 9 देशों के पास कुल मिलाकर लगभग 12,241 परमाणु हथियार हैं. इनमें से 9,614 हथियार सैन्य इस्तेमाल के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
| देश का नाम | वारहेड (अनुमानित संख्या) | प्रमुख मिसाइल/डिलीवरी सिस्टम |
|---|---|---|
| रूस | 4,300+ | सरमत ICBM, पोसीडॉन ड्रोन |
| अमेरिका | 3,700 | मिनटमैन III, ट्राइडेंट II, B-21 रेडर |
| चीन | 500+ | DF-41 ICBM, हाइपरसोनिक वाहन |
| फ्रांस | 290 | M51 SLBM, राफेल एयरक्राफ्ट |
| ब्रिटेन | 225 | वैनगार्ड पनडुब्बी, ट्राइडेंट मिसाइल |
| पाकिस्तान | 170+ | शाहीन, बाबर, नस्र टैक्टिकल वेपन |
| भारत | 160+ | अग्नि-V, अरिहंत क्लास पनडुब्बी |
| इजरायल | 90 | जेरिको बैलिस्टिक मिसाइल |
| उत्तर कोरिया | 50-60 | ह्वासोंग सीरीज ICBM |
भारत की बात करें तो हमारी परमाणु शक्ति मुख्य रूप से अग्नि सीरीज की मिसाइलों और अरिहंत क्लास की पनडुब्बियों पर टिकी है. पाकिस्तान अपने कम दूरी के टैक्टिकल हथियारों पर फोकस कर रहा है, जबकि इजरायल ने हमेशा अपनी परमाणु क्षमता पर रहस्य बनाए रखा है.
क्या परमाणु अप्रसार संधि (NPT) अब अपनी आखिरी सांसें ले रही है?
ईरान युद्ध ने उस अंतरराष्ट्रीय तंत्र की पोल खोल दी है जो परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए बनाया गया था. ईरान की संसद में अब NPT से बाहर निकलने के लिए बिल पेश किया जा रहा है. उनका तर्क है कि जब यह संधि उनके ठिकानों की रक्षा नहीं कर सकती, तो इसमें रहने का कोई मतलब नहीं है. अप्रैल 2026 में न्यूयॉर्क में होने वाली NPT रिव्यू कॉन्फ्रेंस में बड़े टकराव की आशंका है.
परमाणु केंद्रों पर पारंपरिक हथियारों से हमले करना एक बेहद खतरनाक खेल है. यह सामान्य युद्ध और परमाणु युद्ध के बीच की लकीर को धुंधला कर देता है. आज दुनिया के पास मौजूद परमाणु हथियारों का एक छोटा सा हिस्सा भी ‘न्यूक्लियर विंटर’ लाने के लिए काफी है, जो पूरी मानवता को खत्म कर सकता है. फिर भी, देशों के बीच बम बनाने की यह होड़ रुकती नहीं दिख रही है.
शांतिप्रिय कहे जाने वाले देश भी अब विनाशकारी हथियारों की कतार में खड़े हैं. जिन्न अब बोतल से बाहर है और दुनिया एक नए और खतरनाक परमाणु युग में प्रवेश कर चुकी है.
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