पुराने समय में एक सेठ का बेटा दिन-ब-दिन बुरी आदतों में फंसने लगा। वह लड़कियों के पीछे पड़ता, नशा करता और दिन-रात व्यर्थ समय गंवाता रहता था। सेठ को डर था कि अगर उसने अभी ध्यान नहीं दिया, तो उसका बेटा सबकुछ बर्बाद कर देगा। एक दिन परेशान सेठ ने विद्वान संत के पास जाने का निश्चय किया। उसने संत से कहा, “महाराज, मेरा बेटा सबकुछ बिगाड़ देगा। कृपया उसे सुधार दीजिए।” संत ने शांति से कहा, “उसे मेरे पास भेज दो।” अगले दिन सेठ ने अपने बेटे को संत के पास भेज दिया। संत ने लड़के को एक बाग में ले जाकर कहा, “यह छोटा पौधा है, इसे उखाड़ दो।” लड़के ने बिना किसी हिचकिचाहट के पौधे को उखाड़ दिया।
इसके बाद संत ने दूसरे पौधे की ओर इशारा करते हुए कहा, “अब यह थोड़ा बड़ा पौधा उखाड़ो।” लड़के ने थोड़ा अधिक ताकत लगाई और पौधे को उखाड़ दिया। फिर संत ने एक और बड़े पेड़ की ओर इशारा किया और कहा, “इसे भी उखाड़ दो।” लड़के ने पूरी कोशिश की, लेकिन पेड़ जड़ से बहुत मजबूत था। लड़के ने हार मानते हुए कहा, “महाराज, यह तो संभव नहीं है।” संत ने उसे समझाया, “देखो बेटा, बुरी आदतें भी इसी तरह होती हैं। अभी तुम छोटे हो, इसलिए बुरी आदतों की जड़ कमजोर है। अगर तुम उन्हें अभी छोड़ दोगे, तो जीवन सफल बनेगा, लेकिन यदि इन्हें समय पर नहीं रोका गया, तो ये धीरे-धीरे मजबूत होकर जीवन को बर्बाद कर देंगी।” लड़के को संत की बातें समझ में आ गईं। उसने तय किया कि वह अपनी बुरी आदतों को तुरंत छोड़ देगा। धीरे-धीरे वह लड़का अच्छा और जिम्मेदार बन गया। प्रसंग की सीख .