वैज्ञानिकों के रिसर्च पेपर जितने गंभीर होते हैं, कॉन्फ्रेंस टॉक्स में उनके जोक्स (चुटकुले) उतने ही कम असरदार निकल रहे हैं। प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी बी में छपी एक स्टडी के मुताबिक 14 बायोलॉजी कॉन्फ्रेंस के 531 प्रेजेंटेशन में की गई हंसी-मजाक की 66% कोशिशें फ्लॉप रहीं। इन पर दर्शकों ने या तो हल्की-सी शिष्टाचार वाली मुस्कान दी या फिर कोई रिएक्शन नहीं दिया। स्टडी में कुल 870 जोक्स दर्ज किए गए। इनमें से सिर्फ 9% जोक्स पर पूरी ऑडियंस खुलकर हंसी। करीब 24% मौकों पर जोक्स को मध्यम सफलता मिली, यानी लगभग आधे लोग हंसे। स्टडी की सह-लेखिका विक्टोरिया स्टाउट के अनुसार वैज्ञानिक मजाक को जरूरी स्किल नहीं मानते। उनका कहना है कि ह्यूमर से लोग आपको ज्यादा याद रखते हैं और सहयोग की संभावना भी बढ़ती है। महिलाओं की तुलना में पुरुषों ने अधिक जोक्स किए अध्ययन के अनुसार, महिला वैज्ञानिकों के मुकाबले पुरुषों ने मंच पर अधिक जोक्स सुनाए और मजाक करने का रिस्क लिया। कुल प्रेजेंटेशन में से लगभग 60% में कम से कम एक बार हंसी का माहौल बनाने की कोशिश की गई। वहीं, 40% वैज्ञानिकों ने अपनी बात पूरी तरह गंभीर रखी, ताकि जोक फेल होने का कोई खतरा न रहे। बोरियत से शुरू हुई नोटिंग, फिर बन गई स्टडी सह-लेखिका विक्टोरिया स्टाउट ने पीएचडी की बोरियत दूर करने के लिए वक्ताओं के जोक्स नोट किए, जो बाद में रिसर्च का आधार बने। उन्होंने इटली के स्टेफानो मैमोला के साथ 2022-24 के बीच 14 बायोलॉजी कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया। टीम ने यह भी रिकॉर्ड किया कि मजाक करने के बाद वक्ता दर्शकों की हंसी के लिए कितनी देर तक इंतजार करते हैं। खुद की गलतियों पर बने सबसे ज्यादा मजाक वैज्ञानिकों के जोक्स में सबसे ज्यादा चर्चा खुद की गलतियों और तकनीकी दिक्कतों की रही, जिसे शोधकर्ताओं ने मानवीय पहलू माना। रिसर्च टॉपिक व फील्ड वर्क के किस्से भी कॉमेडी का जरिया बने। साइंस राइटर टायलर सोडरबोर्ग ने कहा कि बायोलॉजिस्ट्स का जोक्स के प्रति यह उत्साह अच्छी बात है, भले ही वे हर बार दर्शकों को हंसाने में पूरी तरह सफल न हो पाए हों। .