RBI मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की मीटिंग आज से: ब्याज दर 0.25% घट सकती है, अभी RBI की रेपो रेट 5.50% पर

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नई दिल्ली5 मिनट पहले

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रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की मीटिंग आज यानी 3 दिसंबर से शुरू हो रही है। यह मीटिंग 5 दिसंबर तक चलेगी और इसी दिन इसमें लिए गए फैसलों का ऐलान किया जाएगा। RBI की MPC की इस मीटिंग में ब्याज दरों में 0.25% की कटौती की जा सकती है। अभी RBI की रेपो रेट 5.50% पर है।

अगर ऐसा होता है तो लोन और ब्याज की दरें थोड़ी कम हो सकती हैं, जिससे आम लोगों और कारोबारियों को राहत मिल सकती है। यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत हो सकता है। क्योंकि इससे कर्ज सस्ता होगा और कारोबार को बढ़ावा मिलेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी महंगाई पूरी तरह काबू में है और आगे भी इसके और कम होने की उम्मीद है।

इस साल 3 बार घटा रेपो रेट, 1% की कटौती हुई RBI ने फरवरी में हुई मीटिंग में ब्याज दरों को 6.5% से घटाकर 6.25% कर दिया था। मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की ओर से ये कटौती करीब 5 साल बाद की गई थी।

दूसरी बार अप्रैल में हुई मीटिंग में भी ब्याज दर 0.25% घटाई गई। जून में तीसरी बार दरों में 0.50% कटौती हुई। यानी, मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी ने तीन बार में ब्याज दरें 1% घटाई। हालांकि इसके बाद हुई दो मीटिंगों में इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया।

रेपो रेट के घटने से क्या बदलाव आएगा? रेपो रेट घटने के बाद बैंक भी हाउसिंग और ऑटो जैसे लोन्स पर अपनी ब्याज दरें कम कर सकते हैं। आपके सभी लोन सस्ते हो सकते हैं और EMI भी घटेगी। ब्याज दरें कम होंगी तो हाउसिंग डिमांड बढ़ेगी। ज्यादा लोग रियल एस्टेट में निवेश कर सकेंगे।

रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ाता और घटाता क्यों है? किसी भी सेंट्रल बैंक के पास पॉलिसी रेट के रूप में महंगाई से लड़ने का एक शक्तिशाली टूल है। जब महंगाई बहुत ज्यादा होती है, तो सेंट्रल बैंक पॉलिसी रेट बढ़ाकर इकोनॉमी में मनी फ्लो को कम करने की कोशिश करता है।

पॉलिसी रेट ज्यादा होगी तो बैंकों को सेंट्रल बैंक से मिलने वाला कर्ज महंगा होगा। बदले में बैंक अपने ग्राहकों के लिए लोन महंगा कर देते हैं। इससे इकोनॉमी में मनी फ्लो कम होता है। मनी फ्लो कम होता है तो डिमांड में कमी आती है और महंगाई घट जाती है।

इसी तरह जब इकोनॉमी बुरे दौर से गुजरती है तो रिकवरी के लिए मनी फ्लो बढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सेंट्रल बैंक पॉलिसी रेट कम कर देता है। इससे बैंकों को सेंट्रल बैंक से मिलने वाला कर्ज सस्ता हो जाता है और ग्राहकों को भी सस्ती दर पर लोन मिलता है।

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