रथ सप्तमी 25 जनवरी को: माघ शुक्ल सप्तमी पर सूर्य देव और मां नर्मदा की पूजा करने की परंपरा, जानिए पूजा विधि और मान्यताएं

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8 घंटे पहले

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रविवार, 25 जनवरी को माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि है। इस तिथि पर नर्मदा नदी की जयंती मनाई जाती है। इसे रथ सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि रथ सप्तमी पर सूर्य देव अपने रथ पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर यात्रा शुरू करते हैं, इसलिए इस दिन सूर्य पूजा का विशेष महत्व है। आमतौर पर रथ सप्तमी के बाद से शीत ऋतु का असर कम होने लगता है। ये पर्व मौसम परिवर्तन का भी प्रतीक है।

इस साल रथ सप्तमी रविवार को पड़ रही है, इस कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। रविवार सूर्य देव का दिन माना जाता है और सप्तमी तिथि भी सूर्य देव से ही जुड़ी हुई है। ऐसे में रविवार और रथ सप्तमी का यह संयोग बहुत शुभ है। इस दिन सूर्य देव के साथ-साथ मां नर्मदा की पूजा करने से अक्षय पुण्य फल मिल सकता है, ऐसा पुण्य, जिसका असर जीवनभर बना रहता है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, रथ सप्तमी पर पूजा-पाठ के बाद दान-पुण्य जरूर करना चाहिए। इससे कुंडली के ग्रह दोष दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। जिन लोगों के लिए नर्मदा नदी के तट पर जाकर पूजा करना संभव नहीं है, वे अपने घर पर ही मां नर्मदा का ध्यान करते हुए विधि-विधान से पूजा कर सकते हैं।

नर्मदा नदी से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं

ग्रंथों के अनुसार नर्मदा नदी सबसे पवित्र नदियों में से है। मान्यता है कि मां नर्मदा की उत्पत्ति भगवान शिव के पसीने की बूंदों से हुई थी। इसी कारण नर्मदा को शिव की पुत्री भी कहा जाता है। इस नदी को रेवा के नाम से भी जाना जाता है। स्कंद पुराण में इसका विशेष उल्लेख मिलता है। इसके अलावा मैकल पर्वत से निकलने के कारण इस नदी को मैकलसुता भी कहते हैं। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक पर्वत से निकलती है और करीब 1300 किलोमीटर का लंबा सफर तय करते हुए गुजरात के खंभात की खाड़ी में अरब सागर में समाहित होती है।

नर्मदा नदी की परिक्रमा करने की भी परंपरा है, इसे नर्मदा परिक्रमा कहा जाता है। माना जाता है कि नर्मदा की परिक्रमा करने से जीवन के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्कंद पुराण में यह भी बताया गया है कि प्रलय काल में भी नर्मदा नदी रहेगी। वहीं मत्स्य पुराण के अनुसार, नर्मदा के दर्शन मात्र से ही व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं, जीवन में शुद्धता और सकारात्मकता आती है।

रथ सप्तमी पर ऐसे करें सूर्य देव की पूजा

रथ सप्तमी पर सूर्योदय से पहले स्नान करें, इसके बाद तांबे के लोटे में जल भरें। उसमें लाल फूल, चावल और थोड़ा सा रोली, कुमकुम डालें। इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करें।

अर्घ्य देते समय ऊँ सूर्याय नमः मंत्र का जप करें। इस मंत्र का कम से कम 108 बार जप करना चाहिए। सूर्य को अर्घ्य देने से धर्म लाभ के साथ ही स्वास्थ्य लाभ भी मिलते हैं। सूर्य पूजा से आत्मविश्वास बढ़ता है। इस दिन सूर्य देव के लिए गुड़, गेहूं या लाल वस्त्र का दान करना चाहिए।

रविवार और रथ सप्तमी के योग में करें ये शुभ काम

रथ सप्तमी पर पूजा-पाठ के बाद दान करना विशेष फलदायी माना गया है। इस दिन किसी गौशाला में जाकर गायों को हरी घास खिलाएं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन, वस्त्र, अन्न और भोजन का भी दान करें।

किसी मंदिर में जाकर पूजा से जुड़ी सामग्री जैसे धूप, दीप, फूल या प्रसाद अर्पित कर सकते हैं। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।

इस दिन भगवान शिव की भी पूजा करनी चाहिए, क्योंकि मां नर्मदा को शिव जी पुत्री माना जाता है। शिवलिंग पर जल अर्पित करें और ऊँ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार जप करें। शिवलिंग पर बिल्व पत्र, धतूरा, जनेऊ अर्पित करें। इसके बाद चंदन से तिलक करें और धूप-दीप जलाकर आरती करें। भोग में मिठाई या फल अर्पित करें।

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