चश्मा लगाने की झंझट खत्म, 2 बूंद आई ड्रॉप आंखों में डाल लीजिए और पूरा दिन पढ़ते रहिए, तैयार हो गया दवा का फॉर्मूला

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Eye Drop end spectacles need: वैज्ञानिकों ने एक ऐसा आई ड्रॉप तैयार किया है जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि इससे पढ़ने के लिए चश्मे की जरूरत नहीं पड़ेगी.

चश्मा लगाने की झंझट खत्म, 2 बूंद आई ड्रॉप आंखों में डाल लीजिए और पूरा दिन पढ़ेक्लीनिकल ट्रायल में चश्मे की जरूरत खत्म हो गई.
Eye Drop end spectacles need: वैज्ञानिकों ने एक ऐसा आई ड्रॉप तैयार किया जिससे पढ़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले चश्मे की जरूरत खत्म हो जाएगी. स्टडी में इसके शानदार परिणाम सामने आए हैं. दरअसल, उम्र बढ़ने के साथ अधिकतर लोगों की आंखों में पास की चीजें देखने की क्षमता कमजोर होने लगती है. अखबार या किताबें पढ़ने के दौरान अक्षर को देखने पर दिक्कतें होती हैं. इस समस्या को मेडिकल भाषा में प्रेसबायोपिया कहा जाता है. इसमें पास रखी किताब, मोबाइल स्क्रीन या छोटे अक्षरों वाला कोई भी टेक्स्ट साफ दिखाई नहीं देता और लोग मजबूरन रीडिंग ग्लासेस यानी पढ़ाई के चश्मे का इस्तेमाल करने लगते हैं. लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई दवा खोज निकाली है जो इस परेशानी से राहत दिला सकती है.

यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कैटरेक्ट एंड रिफ्रेक्टिव सर्जन्स की एक बड़ी दो साल की स्टडी में सामने आया है कि पिलोकार्पीन और डायक्लोफेनैक से बनी इन विशेष आई ड्रॉप्स को दिन में दो से तीन बार इस्तेमाल करने से लोगों की नजदीक की चीजें साफ देखने की क्षमता कई गुना बेहतर हो गई. ज्यादातर लोगों ने चश्मे के बिना छोटे अक्षर पढ़ने में सफलता पाई और उनकी यह क्षमता पूरे दो साल तक बनी रही. इस खोज को प्रेसबायोपिया से जूझ रहे करोड़ों लोगों के लिए बड़ी उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा है.

प्रेसबायोपिया क्या है और कैसे बढ़ती है परेशानी

टीओआई की खबर के मुताबिक प्रेसबायोपिया एक कुदरती स्थिति है जो आमतौर पर 40 साल की उम्र के बाद लगभग हर व्यक्ति में देखने को मिलती है. उम्र बढ़ने के साथ आंखों के लेंस की लोच यानी फोकस करने की क्षमता कम हो जाती है. इसी कारण पास रखी किताब, मोबाइल फोन या कंप्यूटर स्क्रीन धुंधली नज़र आने लगती है. अब तक इसका मुख्य समाधान चश्मा पहनना ही रहा है. हालांकि, कुछ लोग कॉन्टैक्ट लेंस या लेजर सर्जरी का विकल्प भी चुनते हैं लेकिन यह हर किसी के लिए सुविधाजनक या सुरक्षित नहीं होता.

ड्रॉप लेने से नजदीकी अक्षर दिखने लगा

इस नए अध्ययन में हजारों लोगों को शामिल किया गया और दो साल तक उनकी आंखों की स्थिति पर निगरानी रखी गई. रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों ने दिन में दो बार पिलोकार्पीन और डायक्लोफेनैक वाली आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया, उनकी पास की चीजें देखने की क्षमता बेहतर हो गई. इनमें से ज्यादातर लोग छोटे अक्षरों वाली जॉगर चार्ट पर अतिरिक्त दो या उससे ज्यादा पंक्तियां आसानी से पढ़ पाने लगे. दिलचस्प यह रहा कि हल्के प्रेसबायोपिया वाले लोगों पर कम डोज वाली ड्रॉप ही कारगर रही जबकि गंभीर मामले में ज्यादा ताकत वाली ड्रॉप्स की जरूरत पड़ी. इस तरह यह दवा अलग-अलग स्तर की समस्या के हिसाब से असर दिखाती है.

साइड इफेक्ट और सुरक्षित विकल्प

वैज्ञानिकों ने आई ड्रॉप्स से जुड़े साइड इफेक्ट पर भी नजर रखा. इसमें देखा गया कि ड्रॉप से हल्का सिर दर्द, थोड़ी देर के लिए धुंधला दिखना या हल्की जलन जैसी समस्याएं हो रही है. लेकिन यह असर अस्थायी था और जल्दी कम हो गया.इससे ज्यादा परेशानी नहीं हुई. गंभीर दुष्प्रभाव जैसे रेटिना संबंधी परेशानी, बहुत ही कम मामलों में सामने आए. शोधकर्ताओं का मानना है कि यह दवा कई लोगों को चश्मे से राहत देने के लिए एक सरल और नॉन-इनवेसिव विकल्प हो सकती है. हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि लंबे समय तक उपयोग और बड़े स्तर पर हुए परीक्षणों से ही यह पूरी तरह साबित किया जा सकेगा कि यह दवा सभी के लिए बिल्कुल सुरक्षित है.

LAKSHMI NARAYAN

Excelled with colors in media industry, enriched more than 18 years of professional experience. L. Narayan contributed to all genres viz print, television and digital media. He professed his contribution in the…और पढ़ें

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