कैदी नंबर 466… कहानी अफ्रीका के उस गांधी की, भारत जिनका था दूसरा घर

Nelson Mandela Death Anniversary: अन्‍याय का चक्र जब हद से ज्‍यादा बढ़ जाता है. लोगों के दमन पर उतारू हो जाता है तो उसके खिलाफ बिगुल फूंकना ही पड़ता है. भारत में जब अंग्रेजों का अत्‍याचार रूह को चीरने लगा तो गांधीजी आए और बिना किसी हथियार के गोरों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. उसी तरह दक्षिण अफ्रीका में जब रंगभेद के दमनचक्र ने इंतहा को भी पार कर दिया तो ‘अफ्रीका के गांधी’ यानी नेल्‍सन मंडेला ने इससे मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया. उन्‍हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. जिस उम्र में लोग जिंदगी का लुत्‍फ उठाते हैं, उस आयु में वे लोगों को दमन चक्र से बचाने का प्रयास कर रहे थे. उन्‍हें 27 साल तक जेल में रहना पड़ा था. इस तरह उनकी पूरी जवानी जेल में कट गई. जेल से छूटने के बाद वे दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्‍वेत राष्‍ट्रपति चुने गए. पूरे देश के साथ ही दुनियाभर में इसका जश्‍न मनाया गया. अश्‍वेत लोगों के खिलाफ उनकी लड़ाई को उस वक्‍त वैश्विक स्‍तर पर मान्‍यता मिली जब उन्‍हें साल 1993 में नोबेल का शांति पुरस्‍कार दिया गया. दक्षिण अफ्रीका में लोग उन्‍हें प्‍यार से मदीबा (Madiba) कहकर संबोधित करते हैं.

दुनिया में बहुत कम ऐसे नेता हुए हैं जिनका जीवन साहस, क्षमा, न्याय और मानवीय मूल्यों का इतना बड़ा प्रतीक बना हो, जैसा कि दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नेल्सन मंडेला का था. मंडेला की पुण्यतिथि पर पूरी दुनिया उन्हें याद करती है. उन्‍हें एक ऐसे इंसान के रूप में याद किया जाता है, जिसने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा जेल में बिताया, फिर भी बदले की भावना नहीं रखी और अपने देश को शांति और समानता की राह पर आगे बढ़ाया. नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका के मवेजो गांव में हुआ था. उस समय देश में नस्लभेद की कठोर नीतियां लागू थीं. अश्वेतों को कोई अधिकार नहीं थे, उन्हें अलग स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों पर रहने को मजबूर किया जाता था. बचपन से ही मंडेला ने इस अन्याय को देखा, समझा और धीरे-धीरे इसमें बदलाव लाने की ठानी. कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) से जुड़कर आंदोलन की राह अपनाई. धीरे-धीरे वे देशभर में नस्लभेद के खिलाफ एक मजबूत आवाज बन गए.

नेल्‍सन मंडेला से जुड़े 5 फैक्‍ट्स

  1. पूरा नाम: नेल्‍सन रोलिहलाहला मंडेला
  2. जन्‍मतिथ‍ि: 18 जुलाई 1918
  3. होमटाउन: मवेजो, दक्षिण अफ्रीका
  4. निधन: 5 दिसंबर 2013
  5. उपनाम: मदीबा
तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला के साथ हाथ में हाथ डालकर केप टाउन में राष्ट्रपति कार्यालय में आयोजित एक आधिकारिक स्वागत समारोह की ओर जाते हुए. यह तस्वीर 22 अगस्त 1996 की है. (फाइल फोटो/AP)

कब हुई थी आजीवन कारावास?

दक्षिण अफ्रीका की श्वेत सरकार ने अश्वेतों पर अपार्थाइड नाम की नीति लागू की थी, जिसके तहत रंगभेद को कानून का रूप दिया गया था. मंडेला ने इस शासन के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन किए, रैलियां निकालीं और लोगों को जागरूक किया. सरकार ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया, मगर उनकी आवाज को दबा नहीं सकी. साल 1964 में मंडेला को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. उन्हें रॉबेन आईलैंड की जेल भेजा गया, जहां हालात बेहद कठिन थे. लेकिन इन 27 सालों में भी मंडेला का मनोबल नहीं टूटा. वे जेल में भी पढ़ते रहे, लिखते रहे और साथियों को मजबूत रहने की प्रेरणा देते रहे. मंडेला की गिरफ्तारी ने दुनिया को झकझोर दिया. कई देशों में उनके समर्थन में अभियान चले. फ्री मंडेला एक ग्‍लोबल मूवमेंट बन गया. विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और नेताओं ने दक्षिण अफ्रीका सरकार पर दबाव बनाया कि वह मंडेला को रिहा करे. आखिरकार 11 फरवरी 1990 को मंडेला को जेल से रिहा किया गया. उनकी रिहाई उस समय पूरी मानवता के लिए जीत जैसी थी.

मैं कड़वाहट लेकर बाहर नहीं आया हूं. मैं क्षमा के साथ बाहर आया हूं, क्योंकि बिना क्षमा के कोई भविष्य नहीं हो सकता. – नेल्‍सन मंडेला (जेल से बाहर आने के बाद का बयान)

कब बने राष्‍ट्रपति?

जेल से रिहा होने के बाद मंडेला ने एक बार फिर देश को जोड़ने के काम में खुद को लगा दिया. उन्होंने श्वेत और अश्वेत दोनों समुदायों के बीच विश्वास बढ़ाने की पहल की. साल 1994 में दक्षिण अफ्रीका में पहली बार संपूर्ण लोकतांत्रिक चुनाव हुए और मंडेला देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने. राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने बदले की राजनीति नहीं की. उन्होंने कहा, ‘मैं कड़वाहट लेकर बाहर नहीं आया हूं. मैं क्षमा के साथ बाहर आया हूं, क्योंकि बिना क्षमा के कोई भविष्य नहीं हो सकता.’ मंडेला का सबसे बड़ा योगदान था- न्याय और मेल-मिलाप का संतुलन. उन्होंने ‘ट्रुथ एंड रिकन्सिलिएशन कमीशन’ बनाया जिसमें अपार्थाइड के समय हुए अपराधों को स्वीकार करने और पीड़ितों की बात सुनने का अवसर दिया गया. यह दुनिया के लिए शांति का एक अनोखा मॉडल बन गया कि कैसे घृणा, हिंसा और अन्याय के बाद भी एक देश शांति की राह पकड़ सकता है.

दक्षिण अफ्रीका की श्वेत सरकार ने अश्वेतों पर अपार्थाइड नाम की नीति लागू की थी, जिसके तहत रंगभेद को कानून का रूप दिया गया था. मंडेला ने इस शासन के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन किए, रैलियां निकालीं और लोगों को जागरूक किया. सरकार ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया, मगर उनकी आवाज को दबा नहीं सकी. साल 1964 में मंडेला को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.

नोबेल पुरस्कार और वैश्विक सम्मान

1993 में मंडेला को शांति के प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला. दुनिया ने उन्हें मदीबा का नाम दिया. मदीबा का अर्थ है- राष्ट्रपिता. वे न केवल दक्षिण अफ्रीका बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बन गए. राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी मंडेला ने गरीबों, बीमारों और वंचितों के लिए काम जारी रखा. उन्होंने नेल्सन मंडेला फाउंडेशन बनाई, जो आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के लिए काम कर रही है. 5 दिसंबर 2013 को मंडेला ने अंतिम सांस ली. उनकी मृत्यु पर दुनिया भर में शोक मनाया गया. नेताओं, कलाकारों, खिलाड़ियों और लाखों आम लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. दक्षिण अफ्रीका में 10 दिन का राजकीय शोक रखा गया और उनका अंतिम संस्कार एक वैश्विक घटना बन गया.

आज की दुनिया में मंडेला क्यों जरूरी?

आज जब दुनिया में नफरत, विभाजन और असहिष्णुता बढ़ती दिख रही है, मंडेला की सीख पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण है. उनका संदेश बहुत सरल था- ‘नफरत का जवाब नफरत से नहीं दिया जा सकता. न्याय और समानता के बिना कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता. सच्चा नेतृत्व वही है जो सबको साथ लेकर चले.’ नेल्सन मंडेला केवल एक नेता नहीं थे. वे मानवता की जीती-जागती मिसाल थे. उन्होंने साबित किया कि एक व्यक्ति अपने साहस, त्याग और क्षमा से पूरी दुनिया को बदल सकता है. उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके विचारों को जीवन में अपनाने का संकल्प लेना भी है. मंडेला की विरासत यही कहती है- दुनिया को बदलना मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं…यदि साहस और उम्मीद साथ हो.

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