Balaghat News: बालाघाट का प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल से रिहा होकर 7 साल बाद वतन लौटा है. अक्तूबर 2019 से प्रसन्नजीत फॉरेन एक्ट में बंद था. वहीं, उसकी मानसिक स्थिति पहले भी ठीक न थी. प्रसन्नजीत की वतन वापसी के बाद भी इस सवाल पर अब तक पर्दा डला हुआ है कि वह पाकिस्तान कैसे पहुंचा? लेकिन, साल 2021 में पाकिस्तान से 29 साल बाद रिहा हुए कुलजीत सिंह कछवाहा ने प्रसन्नजीत की बहन तक खबर पहुंचाई कि उनका भाई पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद है. ऐसे में तब से लेकर अब तक बहन संघर्ष करती रही. अपने भाई को मां से मिलाने का सपना पूरा कर दिखाया.
आखिर में पता चला की जेल से छूट रहा हूं
प्रसन्नजीत ने बताया, पाकिस्तान में जेल प्रहरी आए और उन्होंने कपड़े बदलने के लिए कहा. इसके बाद पता चला कि उन्हें पाकिस्तान से आजाद किया जा रहा है. ऐसे में उन्हें 7 भारतीय कैदियों के साथ अटारी वाघा बॉर्डर पर लाकर रिहा किया गया. फिर भारत ने कस्टम और इमिग्रेशन की प्रोसेस पूरी करने के बाद सभी की नानकदेव अस्पताल में मेडिकल जांच करवाई. जीजा को देख प्रसन्नजीत ने नमस्ते कहा. साथ गए रोजगार सहायक आशिष वासनिक ने बताया, चार दिन और तीन रात के सफर के बाद उन्हें घर पहुंचाया.
घर का खाना अच्छा था
प्रसन्नजीत ने बताया, घर पहुंचे तो उन्होंने सालों बाद घर का खाना खाया. घर में सब्जी, दाल चावल उनकी बहन ने खिलाया. जेल का खाना अच्छा नहीं था. घर का खाना बहुत टेस्टी है. अब वह अपनी मां को भी यहीं लाना चाहते हैं. दरअसल, अपने बेटे की याद में उनकी मां भी मानसिक संतुलन खो बैठी है और पड़ोसियों से खान मांग कर खाती है. ऐसे में प्रसन्नजीत मां को महकेपार अपनी बहन के गांव लेकर आना चाहते हैं.
ऐसा था पाकिस्तान की जेल में रूटीन
लोकल 18 ने प्रसन्नजीत रंगारी ने बताया, उन्हें सुबह सात बजे उठाया जाता था. फिर चाय के साथ रोटी दी जाती थी. इसके बाद साढ़े सात बजे से काम करवाते थे. वह वहां पर पत्ते चुनने का काम करते थे, यानी सफाई का काम करवाया जाता था. फिर दोपहर में मटन और चावल देने की बात बताई. वहीं, शाम के समय टीवी दिखाई जाती थी. फिर रात का खाना खिलाकर बैरक में भेजा जाता था. रात 9 बजे सो जाते थे.
मां का तोहफा पूरा हुआ
सालों से प्रसन्नजीत को रिहा करवाने के लिए उनकी बहन संघमित्रा ने संघर्ष किया. प्रसन्नजीत की वतन वापसी पर उन्होंने कहा, 30 अप्रैल को जब मानवाधिकार आयोग के संज्ञान के बाद नागरिकता सत्यापन का काम हो रहा था, उसी दिन रात साढ़े दस बजे पिता की मौत हो गई. इस बात को काफी अफसोस है, लेकिन मां को उनका बेटा लौटा रही हूं, इस बात की खुशी है. उनके भाई की मानसिक स्थिति अब भी ठीक नहीं है. ऐसे में उनका इलाज कराने और पुनर्वास के लिए सरकार से मांग की है.
जमीन बेचकर पढ़ाया था प्रसन्नजीत को
प्रसन्नजीत के पिता काफी उम्रदराज थे. आर्थिक स्थिति ठीक न थी. लेकिन, उनका बेटा पढ़ने में तेज था. ऐसे में पिता ने बेटे को जबलपुर के रामदास खालसा इंस्ट्यूट बी फार्मेसी की पढ़ाई के लिए भेजा. इस दौरान आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण जमीन तक बेचनी पड़ी. इसके बाद उन्होंने पढ़ाई आगे बढ़ाने के लिए मास्टर्स की पढ़ाई भी शुरू की और एक सेमेस्टर तक पढ़ाई की और फिर कमजोर आर्थिक स्थिति ने पढ़ाई भी छुड़वा दी. इस दौरान फार्मेसी लाइसेंस के लिए रजिस्ट्रेशन भी करवाया और नौकरी की तलाश में इंदौर गए. लेकिन, नौकरी नहीं मिली, जिसके बाद सफलता न मिलने पर वह डिप्रेशन का शिकार हो गए और मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा. प्रसन्नजीत का कहना है कि वह आगे नहीं पढ़ने चाहते, लेकिन नौकरी करना चाहते हैं.
मानवाधिकार आयोग के संज्ञान ने करवाई वतन वापसी
31 दिसंबर 2021 को जब संघमित्रा को पता चला कि उनका भाई पाकिस्तान की जेल में बंद है, तब से लेकर 14 महीने तक कलेक्टर कार्यालय और भोपाल के दफ्तरों के चक्कर लगाती रहीं. बालाघाट के क्षेत्रीय विधायक और तत्कालीन सांसद से भी मदद की गुहार लगाई. लेकिन, वहां से भी सिर्फ आश्वासन ही मिला. वहीं, 14 महीने बाद एक दिन पड़ोस के रहने वाले ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट और अधिवक्ता कपिल फूले के पास वह पहुंचीं. फिर उन्होंने प्रसन्नजीत की घर वापसी के लिए मानव अधिकार आयोग में याचिका लगाई. इससे पहले उन्होंने कुलदीप कछवाहा से बातचीत की और तथ्य जुटाए. उन्होंने 21 फरवरी को एक याचिका लगाई. इसमें तीन आधार थे. मसलन चार साल से प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल में बिना ट्रायल और कानूनी मदद के बंद है. मानसिक रूप से बीमार होने के आधार पर भेदभाव की आशंका जताई और इसे मानव अधिकार का उल्लंघन बताया. इसके अलावा उनकी बहन ने प्रशासन से गुहार लगाई. इन तीन आधार पर प्रसन्नजीत की रिहाई और स्वदेश वापसी के अधिकार को प्रोटेक्ट करने की मांग की.
याचिका 8 दिन में रजिस्टर्ड
यह याचिका 2 फरवरी 2024 को लगाई. महज 8 दिन के भीतर आयोग ने मामला रजिस्टर्ड किया और 4 मार्च को प्रसन्नजीत की घर वापसी कार्रवाई तेज कर दी. वहीं, अगले महीने ही पाकिस्तान ने प्रसन्नजीत की सारी जानकारी भारत को भेजी. 30 अप्रैल को संघमित्रा से पुष्टि करवाई और नागरिकता साबित करने दस्तावेज मंगवाए. आखिरकार दो साल के भीतर ही प्रसन्नजीत पाकिस्तान की कैद से आजाद हो गया.
ऐसे लापता हुआ था प्रसन्नजीत
प्रसन्नजीत को अपनी पुरानी जिंदगी की लगभग सारी बाते याद है. लेकिन साल 2015 के बाद उनकी मानसिक स्थिति खराब होने लगी थी. ऐसे में वह कई बार घर से भागे थे. एक बार वह घर से कहीं चले गए थे. लेकिन करीब 8 महीने बाद उन्होंने अपनी बहन को बिहार से फोन किया था. फिर वह लौट कर आए लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से घर से लापता हो गए थे. इसके बाद वह कभी लौट कर नहीं आए. एक समय तक उनकी बहन संघमित्रा और जीजा राजेश खोब्रागड़े ने खोजने की कोशिश की लेकिन नहीं मिलने पर उन्होंने प्रसन्नजीत को मरा हुआ मान लिया. वहीं, साल 2021 के आखिरी दिन 29 साल बाद पाकिस्तान की जेल से छूटे कुलजीत सिंह कछवाहा ने परिजनों को उनके पाकिस्तान की जेल में बंद होने की जानकारी दी.
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