पोलियो ने छीना चलना… मिथिला पेंटिंग से उद्यमी बनी पटना की ममता

दिल्ली:  पटना की रहने वाली ममता भारती की जिंदगी आसान नहीं रही है. महज 5 साल की उम्र में पोलियो ने उनके शरीर को जकड़ लिया. पूरा शरीर लगभग लकवाग्रस्त हो गया. इलाज के लिए पटना के कई अस्पतालों के चक्कर लगाई. डॉक्टरों ने भरसक कोशिश की, लेकिन चमत्कार नहीं हुआ. हालात ऐसे थे कि चलना-फिरना तो दूर, बैठना भी मुश्किल हो गया था, लेकिन किस्मत ने उनसे जो छीना, उससे कहीं ज़्यादा उन्हें अंदर से मजबूत बना दिया.

कला से जुड़ा रिश्ता, दर्द से निकली पहचान

ममता जब उम्र 6-7 साल की थी, तब थोड़ा संभलना शुरू हुई थी. इसी दौर में ममता का दिल कला की तरफ खिंचने लगा. बचपन में जब दूसरे बच्चे उन्हें नजरअंदाज करते थे. अकेलापन उन्हें रुला देता, तब उनके दर्द का सहारा बना उनकी पेंटिंग. मिथिला पेंटिंग करते देखना ममता के लिए सुकून था. वही पल उनकी जिंदगी की दिशा तय कर गया. वहीं से कला सिर्फ उनका शौक नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य बन गया.

संघर्ष के बीच सम्मान की रोशनी

साल 2012 से ममता ने पूरी गंभीरता से कला को अपनाया. जूट के प्रोडक्ट्स, साड़ी, सूट, कुर्ता, बंदी हर चीज में उन्होंने मिथिला पेंटिंग को नई पहचान दी. मेहनत रंग लाई और 2013-14 में उन्हें बिहार सरकार से स्टेट अवॉर्ड मिला. यह सिर्फ सम्मान नहीं था, बल्कि उस सोच पर करारा जवाब था. जो उन्हें कमज़ोर समझती थी.

कलाकार से उद्यमी बनने तक का सफर

2020–21 में ममता ने एक बड़ा कदम उठाया. बिहार स्टार्टअप के तहत उन्होंने शस्त्रकार्ति प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की. कंपनी की डायरेक्टर बनीं, लेकिन रास्ता आसान नहीं था. कंपनी कैसे चलती है, कागज़ी काम, मार्केटिंग कुछ भी आसान नहीं था. ज्ञान की कमी थी, अनुभव नहीं था, लेकिन सीखने की ललक थी. आज वही ममता आत्मविश्वास के साथ अपना बिजनेस संभाल रही हैं.

आज 10 लोगों को दिया है रोजगार

आज ममता की कंपनी में 10 लोग नियमित रूप से काम कर रहे हैं. एक समय जिनके बारे में कहा जाता था कि ये कुछ नहीं कर पाएंगी, वही आज दूसरों को रोज़गार दे रही हैं. यह सिर्फ एक बिजनेस स्टोरी नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण का उदाहरण है. ममता साफ कहती हैं कि मैं आज जिस मुकाम पर हूं, उसमें मेरे माता-पिता और भाइयों का बहुत बड़ा योगदान है. परिवार का भरोसा उनके आत्मविश्वास की सबसे बड़ी ताकत बना.

महिलाओं को दिया ये संदेश

ममता भारती उन महिलाओं के लिए उम्मीद हैं, जो आर्थिक, शारीरिक या सामाजिक वजहों से रुक जाती हैं. उनका संदेश सीधा और सच्चा है. जिंदगी में चाहे जितनी भी मुश्किलें आएं, रुकना नहीं है. लोग क्या कहते हैं, इससे ज़्यादा जरूरी है आप खुद अपने बारे में क्या सोचते हैं.

.

Share me..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *