पीएम मोदी का खास संदेश, टो लाम के राष्ट्रपति बनने पर भारत के लिए क्या बदलेगा?

हनोई: वियतनाम की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हुई है. नेशनल असेंबली ने सर्वसम्मति से कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी तो लाम को देश का नया राष्ट्रपति चुन लिया है. 69 साल के तो लाम अब वियतनाम के सबसे शक्तिशाली नेता बन गए हैं. उनके पास न केवल पार्टी की कमान है, बल्कि अब वे देश के संवैधानिक प्रमुख भी हैं. यह घटना सिर्फ एक नियुक्ति नहीं है, बल्कि वियतनाम की दशकों पुरानी राजनीतिक परंपरा का अंत है. अब तक वियतनाम में सत्ता का बंटवारा कई नेताओं के बीच होता था, ताकि कोई एक व्यक्ति तानाशाह न बन सके. लेकिन तो लाम का राष्ट्रपति बनना यह साफ इशारा करता है कि वियतनाम अब चीन के उस मॉडल को अपना रहा है, जहां शी जिनपिंग ही सर्वेसर्वा हैं. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मौके पर तो लाम को बधाई दी है और दोनों देशों के बीच दोस्ती के नए अध्याय की उम्मीद जताई है.

पुरानी ‘शेयर्ड लीडरशिप’ की परंपरा को छोड़ रहा वियतनाम

वियतनाम में लंबे समय से सत्ता के चार स्तंभों वाली व्यवस्था रही है. इसमें पार्टी चीफ, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और नेशनल असेंबली के अध्यक्ष अलग-अलग व्यक्ति होते थे. इसे ‘कलेक्टिव लीडरशिप’ कहा जाता था. तो लाम के इस नए अवतार ने इस ढांचे को हिला दिया है. अब पार्टी और स्टेट, दोनों की चाबी एक ही जेब में है.

जानकारों का मानना है कि यह बदलाव वियतनाम को चीन और लाओस जैसे देशों की कतार में खड़ा कर देता है. तो लाम का दबदबा जनवरी 2026 में पार्टी चीफ के रूप में उनकी दोबारा नियुक्ति के बाद से ही बढ़ने लगा था.

अब राष्ट्रपति का पद संभालते ही उन्होंने अपनी स्थिति को अभेद्य बना लिया है. उन्होंने नेशनल असेंबली में शपथ लेने के बाद कहा कि उनकी प्राथमिकता शांति और स्थिरता बनाए रखना है. वे चाहते हैं कि विकास का फायदा देश के हर नागरिक तक पहुंचे.

पुलिस अधिकारी से राष्ट्रपति बनने तक का सफर कैसा रहा?

तो लाम की सत्ता तक पहुंचने की कहानी किसी थ्रिलर फिल्म जैसी है. वे एक करियर पुलिस अधिकारी रहे हैं और सुरक्षा सेवाओं से निकलकर राजनीति के शिखर तक पहुंचे हैं. उनकी ताकत का सबसे बड़ा जरिया ‘एंटी करप्शन कैंपेन’ यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी जंग बनी. वे पब्लिक सिक्योरिटी मंत्रालय के प्रमुख थे, तब उन्होंने अपने पूर्ववर्ती के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों पर कार्रवाई की. इस अभियान ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय और विरोधियों के बीच खौफनाक बना दिया.

आज वे वियतनाम में 1980 के दशक के बाद का सबसे बड़ा प्रशासनिक बदलाव कर रहे हैं. वे मंत्रालयों का विलय कर रहे हैं, सरकारी नौकरियां कम कर रहे हैं और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं. उनका लक्ष्य वियतनाम को केवल लेबर और एक्सपोर्ट आधारित देश न रखकर एक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है.

क्या चीन के मॉडल से वियतनाम की इकोनॉमी को पंख लगेंगे?

  • वियतनाम इस समय अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बदलने की कोशिश कर रहा है. सरकार ने अगले पांच सालों के लिए 10% की सालाना ग्रोथ का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. तो लाम का मानना है कि सत्ता का केंद्रीकरण होने से फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे.
  • अक्सर लोकतंत्र या मिली-जुली सत्ता में पॉलिसी बनाने में देरी होती है, लेकिन अब तो लाम के पास ‘स्ट्रॉन्ग मैंडेट’ है. हालांकि, जोखिम भी कम नहीं हैं. जानकारों का कहना है कि अगर सत्ता का केंद्रीकरण सिस्टम के सुधारों से तेज भागने लगे, तो तानाशाही का खतरा बढ़ जाता है.
  • इस समय दुनिया ईरान युद्ध और एनर्जी शॉक से जूझ रही है. वियतनाम की इकोनॉमी भी इससे अछूती नहीं है. 2026 की पहली तिमाही में ग्रोथ 7.8% रही है, जो पिछले साल से तो बेहतर है लेकिन 9.1% के टारगेट से काफी पीछे है. ऐसे में तो लाम के सामने आर्थिक मोर्चे पर बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं.

अमेरिका और चीन के बीच कैसे तालमेल बिठाएंगे तो लाम?

वियतनाम की विदेश नीति हमेशा से ‘बैलेंसिंग एक्ट’ रही है. एक तरफ चीन उसका सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है, तो दूसरी तरफ साउथ चाइना सी को लेकर दोनों के बीच विवाद भी है. वहीं, अमेरिका वियतनाम पर ट्रेड सरप्लस को लेकर दबाव बना रहा है. तो लाम के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी ‘प्रैग्मैटिक’ यानी व्यावहारिक विदेश नीति को बचाए रखना है.

उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वे चीन के करीब भी रहें और अमेरिका से अपने व्यापारिक रिश्तों को भी आंच न आने दें. दुनिया जिस तरह से दो ध्रुवों में बंट रही है, वहां वियतनाम के लिए बीच का रास्ता निकालना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल होने वाला है.

भारत के लिए तो लाम का राष्ट्रपति बनना क्या मायने रखता है?

भारत और वियतनाम के रिश्ते हमेशा से भरोसेमंद रहे हैं. पीएम मोदी ने तो लाम को राष्ट्रपति बनने पर जो बधाई दी है, वह केवल एक शिष्टाचार नहीं है. भारत वियतनाम को अपनी ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का एक मजबूत स्तंभ मानता है. 2016 में जब पीएम मोदी वियतनाम गए थे, तब इन रिश्तों को ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ का नाम दिया गया था.

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