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लोटा बांस एक ऐसा खास बांस है, जो तैयार होने के बाद घर में लोटा और गिलास की जरूरत को कम कर देता है. इसकी आकृति ऐसी होती है कि इसे काटकर बीच का भाग निकालने के बाद इसे लोटा और गिलास की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है.
लोटा बांस, जिसे बुद्धा बेली बांस भी कहा जाता है, अपने फूले हुए पेट के कारण खास प्रभाव डालता है. इसका यह अनोखा आकार इसे बोनसाई के नमूने के रूप में बेहद लोकप्रिय बनाता है. लोटे के आकार वाला यह पौधा सौंदर्य की दृष्टि से भी काफी आकर्षक माना जाता है.

इस पौधे की सबसे खास बात यह है कि जहां इसे अधिक पानी मिलता है, वहां इसकी शाखाएं कम फूलती हैं और यह ऊपर की ओर बढ़ता है. कभी-कभी इसकी ऊंचाई 40 से 50 फीट तक पहुंच जाती है.

अगर आप इसे गमले में उगाना चाहते हैं, तो गमलों में उगाए जाने पर इसकी अत्यधिक ऊंचाई की चिंता करने की जरूरत नहीं है. ऐसे परिस्थितियों में लोटा बांस केवल लगभग 5 फीट तक ही बढ़ता है.

चाहे आप इस पौधे को गमले में लगा रहे हों या बाहर, लोटा बांस एक अद्भुत पौधा है जो आकर्षण बढ़ा सकता है और किसी काम में उपयोगी भी हो सकता है. गमले में या ज़मीन में, यह सजावटी होने के साथ-साथ कटाव को नियंत्रित करता है और बाड़ के रूप में भी काम आता है.

इस बांस का एक बड़ा फायदा यह है कि यह गुच्छों में इकट्ठा होता है, जिससे यह अन्य बांसों की तुलना में बेहतर माना जाता है क्योंकि इसके फैलने और किसी क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की संभावना कम होती है. पूर्वोत्तर भारत में इसके मुख्य हिस्से को काटकर लोटा बनाया जाता है, जिसका प्रयोग लोग पेय पदार्थों के लिए करते हैं.

लोटा बांस का पौधा पूरी या आंशिक धूप दोनों पसंद करता है. यदि इसे बाहर लगाया जाए, तो ऐसी जगह रखें जहाँ दिन में 6 से 8 घंटे धूप मिले. गमले में लैंडस्केप में रखते समय सुनिश्चित करें कि दोपहर की तेज धूप से इसे कुछ छाया मिले.

यह लोटा बांस सुल्तानपुर शहर मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर, वाराणसी-लखनऊ राजमार्ग पर स्थित नंद गांव ढाबा में तैयार किया गया है. इसे तैयार करने वाले डॉक्टर कौशलेंद्र बताते हैं कि यह एक यूनिक बांस है, जो किसानों और अन्य लोगों के लिए आय का अच्छा स्रोत बन सकता है. इसके निर्माण में भी ज्यादा लागत नहीं आती.

पर्यावरणविद् डॉक्टर कौशलेंद्र ने लोकल 18 को बताया कि लोटा बांस उपोष्णकटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्रों में अच्छे से पनपेगा, क्योंकि इसे मध्यम तापमान और आर्द्रता पसंद है. सुल्तानपुर जैसे जिलों में यह पौधा उगाने के लिए बेहद उपयुक्त है.
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