ओजोन प्रदूषण: देश पर आ गई नई आफत! एयर पॉल्यूशन से कितना खतरनाक? NGT के बाद एक्सपर्ट भी चिंतित

Ozone pollution in Delhi-NCR: अभी तक आपने वायु प्रदूषण के बारे में ही सुना होगा और एनसीआर या आसपास के इलाकों में रहते हैं तो इसे भोगा भी होगा, लेकिन अब देश पर नया संकट मंडरा रहा है. यह संकट सिर्फ इंसानों और जानवरों का ही दम नहीं घोंटेगा, बल्कि इससे पेड़, पौधे और फसलें भी नहीं बच पाएंगे. यह नई आफत है ओजोन प्रदूषण. हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की एक रिपोर्ट पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें भारत के कई शहरों में ओजोन प्रदूषण का स्तर काफी ज्यादा बढ़ने की बात की गई है.

ओजोन को बढ़ाने वाली गैसें सिर्फ शहरों को ही प्रभावित नहीं करतीं बल्कि इनमें लंबी दूरी तक असर डालने की क्षमता होती है, ऐसे में यह भारत के ग्रामीण क्षेत्रों को भी नुकसान पहुंचाने में आगे हैं. हालांकि सवाल उठता है कि ओजोन प्रदूषण, वायु प्रदूषण से कितना अलग है? और यह हेल्थ को कितना प्रभावित करता है? इसका जवाब सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरनमेंट के पॉल्यूशन एक्सपर्ट विवेक चट्टोपाध्याय यहां दे रहे हैं. आइए जानते हैं.

सवाल-सामान्‍य वायु प्रदूषण जो हर साल होता है, उसमें और ओजोन प्रदूषण में क्‍या अंतर है?

जवाब- सामान्य वायु प्रदूषण मुख्य रूप से वातावरण में पार्टीकुलेट मैटर (जो कि काफी महीनतम 2.5 माइक्रोन से छोटे होते हैं) के लेवल्स को दिखाता है. पीएम 2.5 जब देश में जगह -जगह सेफ लेवल्स (जैसे कि NAAQS) से ज्यादा होता हैं और नाइट्रोजन ऑक्साइड(NOx), कार्बन डाई ऑक्साइड (CO) इत्यादि गैसों का स्तर भी सुरक्षित लेवल से ज्यादा होता है तो यह वायु प्रदूषण कहलाता है. वहीं ओजोन की बात करें तो ये भी एक चिंताजनक प्रदूषक तत्व है लेकिन यह किसी स्त्रोत से सीधे वायुमंडल में उत्पन्न नहीं होता बल्कि यह सूर्य की तेज धूप में नाइट्रोजन ऑक्साइड और हाईड्रोकार्बन की रासायनिक क्रिया के प्रतिफल से बनता है.

ओजोन प्रदूषण एक घातक ऑक्सीडेंट है जो एक तरह के जंग लगने का काम करता है. इससे शरीर के वायुमार्ग में जलन, खांसी, सांस का फूलना, सांस लेने में तकलीफ होना आदि परेशानियां पैदा हो सकती हैं. इसकी मात्रा बड़े शहरों में बढ़ती जा रही है क्योंकि इसे उत्पन्न करने वाली गैसें जैसे नाइट्रोजन ऑक्साइड(NOx) और हाईड्रोकार्बन (HC) की मात्रा गर्मियों की तेज धूप में और अब तो सर्दियों के कुछ गर्म दिनों में इसका बनना आम बात हो गई है. यानि ओजोन को बनने से रोकने के लिए इसे बनाने वाली गैसों की मात्रा कम करनी होगी. पेट्रोल या डीजल की गाड़ियां और पावर प्लांट इंडस्ट्रीज इन गैसों को बढ़ाने वाले प्रमुख स्रोत हैं.

सवाल- ओजोन प्रदूषण का स्‍वास्‍थ्‍य पर क्‍या असर पड़ता है? क्‍या यह वायु प्रदूषण से ज्‍यादा खतरनाक है?

जवाब- जैसा ऊपर जिक्र किया गया है कि यह सांस की तकलीफों की प्रमुख वजह है. एक तो इसके हाई लेवल्स फेफड़ों को कमजोर करते हैं, दूसरा इम्यनिटी पर दबाव डालते हैं. ऊपर से पार्टिकुलेट मेटर्स का स्तर भी दुष्प्रभाव डालता है. ऐसे में स्थिति यह हो जाती है कि व्यक्ति का नेचुरल डिफेंस सिस्टम कमजोर हो जाता है और वह किसी भी बैक्टीरिया या वायरस का आसानी से शिकार बन जाता है. कुल मिलाकर सभी प्रदूषकों का मिल जुलकर ज्यादा दुष्प्रभाव पड़ता है. ओजोन प्रदूषण पौधों या फसलों की पैदावार भी कम कर देता है.इसीलिए इसका बढ़ता लेवल देश के लिए काफी चिंताजनक है.

सवाल- ओजोन प्रदूषण स‍िर्फ भारत में ही है या बाहर के देशों में भी है? इसके यहां बढ़ने के क्‍या कारण हो सकते हैं?

जवाब- ओजोन लगभग हर देश की समस्या है. जो देश पीएम 2.5 में कमी ला चुके हैं, वे भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, क्योंकि ओजोन को कम करने के लिए एक ऐसे समग्र एक्शन प्लान की जरूरत है जो कई पॉल्यूटेंट्स पर एक्शन ले सके और सख्त पॉल्यूशन लिमिट्स तय कर करे. भारत को अब भारत स्टेज सेवन (BHARAT STAGE SEVEN) मानक की दिशा में भी सोचना होगा जो कि एनओएक्स को काफी कम करेगा. इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर तेजी से बढ़ना होगा. साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि पावर प्लांट में NOx का उत्सर्जन कम हो. हाईड्रोकार्बन के स्त्रोतों पर लगाम लगानी होगी. इसके अलावा यह सुनिश्चित करना होगा कि सॉल्वेंटस का इस्तेमाल, इवेपोरेटिव एमीशन पेट्रोल पंपों से नियंत्रित हो. हमारा NCAP प्रोग्राम अभी पीएम 10 पर फोकस्ड है, हमें NAAQS के सारे प्रमुख पॉल्यूटेंट्स के मद्देनजर कॉम्प्रिहेंसिव प्लानिंग करनी होगी.

सवाल. क्‍या एक सामान्‍य व्‍यक्‍त‍ि ओजोन प्रदूषण को कंट्रोल करने में कुछ योगदान दे सकता है?

जवाब- डीजल की गाड़ियां, पेट्रोल की गाड़ियों के मुकाबले ज्यादा एनओएक्स का उत्सर्जन करती हैं, हालांकि पेट्रोल गाड़ियों में भी अगर ट्यूनिंग सही न हो तो NOX या एचसी का उत्सर्जन बढ़ सकता है. इसलिए अच्छे वर्कशॉप में गाड़ियों का मेंटेनेंस और रिपेयर करवाएं. अगर संभव है तो इलेक्ट्रिक व्हीकल पर शिफ्ट हो जाएं. ध्यान रखें कि मलफंक्शन इंडिकेटर लाइट (mulfunction indicator light) अगर संकेत दे रहा है तो जरूर सर्विस कराएं. इसके अलावा सरकार से मांग करें कि लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए, विशेषकर बच्चों के लिए एयर पॉल्यूशन कंट्रोल प्लान कंप्रिहेंसिव (air pollution control plan comprehensive) हो और इसका नतीजा भी जन सुनवाई में पेश किया जाए. डॉक्टरों को भी मल्टीपल एयर पॉल्यूटेंट्स के बारे में मरीजों को और सरकार को अवगत कराना चाहिए.

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