एक डील और 3 टारगेट, ट्रंप के इस कदम से चित्त होगा चीन, देखता रह जाएगा रूस-पाकिस्तान

US Taiwan Defence Deal: ताइवान को लेकर China और United States के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं. चीन लंबे समय से Taiwan को अपना हिस्सा बताता रहा है और किसी भी देश द्वारा ताइवान के समर्थन को वह सख्ती से नापसंद करता है. ऐसे में अमेरिका और ताइवान के बीच प्रस्तावित बड़ा रक्षा समझौता बीजिंग को नाराज कर सकता है.

समाचार एजेंसी Reuters की एक रिपोर्ट के मुताबिक ताइवान के लिए उन्नत इंटरसेप्टर मिसाइलों समेत करीब 14 अरब डॉलर का रक्षा पैकेज अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की मंजूरी के लिए तैयार है. सूत्रों के अनुसार इस डील को इस महीने ट्रंप के चीन दौरे के बाद मंजूरी दी जा सकती है.

क्यों नाराज हो सकता है चीन?

ताइवान लगातार चीन के सैन्य दबाव का सामना कर रहा है. ऐसे में यह रक्षा सौदा उसके लिए अब तक का सबसे बड़ा रक्षा समझौता माना जा रहा है. माना जा रहा है कि यह डील ताइवान की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करेगी, जिससे चीन की नाराजगी बढ़ सकती है.

सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप का 31 मार्च से 2 अप्रैल के बीच Beijing दौरा प्रस्तावित है. इसी दौरान इस रक्षा समझौते को अंतिम रूप दिया गया है और ट्रंप की वापसी के बाद इसके आधिकारिक ऐलान की संभावना जताई जा रही है.

इससे पहले चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping ने फरवरी में कहा था कि ताइवान के साथ रक्षा सौदों को लेकर सावधानी बरती जानी चाहिए. ट्रंप प्रशासन के इस कदम से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका ताइवान के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते बनाए रखना चाहता है और उसे सैन्य मदद भी बढ़ा सकता है.

डील के रणनीतिक मायने

विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील एक तरफ एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाने की कोशिश हो सकती है, वहीं दूसरी ओर चीन के बढ़ते प्रभाव को संदेश देने की रणनीति भी मानी जा रही है. China के विदेश मंत्रालय ने समाचार एजेंसी Reuters से कहा है कि United States द्वारा Taiwan को हथियार बेचने के कदम का चीन की सरकार एकजुट होकर विरोध करेगी.

चीन का कहना है कि ताइवान को हथियारों की बिक्री क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकती है. गौरतलब है कि चीन लंबे समय से ताइवान को अपना हिस्सा बताता रहा है और वह लगातार अमेरिका से मांग करता रहा है कि वह ताइवान को हथियार बेचना बंद करे. बीजिंग का मानना है कि इस तरह के रक्षा सौदे “वन चाइना पॉलिसी” के सिद्धांत के खिलाफ हैं और इससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है. वहीं अमेरिका ताइवान की सुरक्षा के लिए उसे रक्षा उपकरण उपलब्ध कराने की नीति पर कायम है.

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