ग्वालियर में आयोजित 101वें तानसेन समारोह के चौथे दिन संगीत प्रेमियों ने कर्नाटक संगीत पद्धति के वायलिन वादन, शास्त्रीय गायन और सितार वादन का आनंद लिया। इन संगीत सभाओं ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
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दिन की पहली संगीत सभा में कर्नाटक संगीत पद्धति के वायलिन वादन की जुगलबंदी प्रस्तुत की गई। संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड से सम्मानित डॉ. मैसूर मंजूनाथ और उनके बेटे सुमन्थ मंजूनाथ ने मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत आदिताल में निबद्ध राग बहुधारी से की। इसके बाद विलंबित आदिताल में राग षडमुखप्रिया और रागमाला की प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अगली प्रस्तुति संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित सुविख्यात गायिका कलापिनी कोमकली ने दी। उन्होंने अपने गायन की शुरुआत राग मारू बिहाग से की, जिसमें उन्होंने बड़ा खयाल की परंपरागत बंदिश ‘रसिया हो न जाओ’ को विस्तार से प्रस्तुत किया। इसके बाद मध्य लय की बंदिश ‘सुनो सखी सैयां’ का सजीव गायन हुआ, जो उनके पिता और गुरु पद्मभूषण कुमार गंधर्व की रचना है। अंत में, परंपरागत द्रुत रचना ‘डरपत रैन दिन’ की सशक्त प्रस्तुति ने श्रोताओं को प्रभावित किया।
संगीत सभा का समापन काशी से आए पद्मश्री पंडित शिवनाथ मिश्र और उनके पुत्र देवव्रत मिश्र के सितार वादन से हुआ। उन्होंने अपनी प्रस्तुति के लिए राग कौशिक कान्हड़ा का चयन किया। आलाप, जोड़ और झाला के साथ उन्होंने इस राग में दो गतें बजाईं।
