OMG! जौहरी ने गहनों के बजाय मिट्टी से गढ़ी ढाई हजार गणेश प्रतिमाएं…9 साल से मुफ्त में कर रहे अनोखी सेवा

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Ajab Gajab News: खंडवा के जौहरी धर्मेंद्र सोनी ने पिछले 9 सालों में ढाई हजार से ज्यादा मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं निःशुल्क बनाई और बांटी हैं. वे बच्चों और युवाओं को पर्यावरण हितैषी गणेश प्रतिमा बनाने की कला भी सि…और पढ़ें

कहते हैं कि असली सोना वही है जो लोगों के दिलों में चमकता है. खंडवा जिले के धर्मेंद्र सोनी, जिन्हें लोग एक साधारण जौहरी के रूप में जानते हैं, ने अपने हुनर और आस्था से एक अनोखा काम कर दिखाया है. पिछले 9 सालों से वे मिट्टी से गणेश प्रतिमाएं बनाकर बच्चों और युवाओं को निःशुल्क कला सिखा रहे हैं.

अब तक धर्मेंद्र करीब ढाई हजार से ज्यादा प्रतिमाएं समाज को मुफ्त में भेंट कर चुके हैं. उनकी इस साधना का सम्मान खुद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव भी कर चुके हैं.

कैसे हुई शुरुआत?
धर्मेंद्र बताते हैं कि सब कुछ एक संयोग से शुरू हुआ. 9 साल पहले उनकी दुकान पर दो बच्चियां आईं और उनसे गणेश प्रतिमा बनाने की जिद करने लगीं. शुरुआत में उन्होंने कहा कि उन्हें यह नहीं आता, लेकिन बच्चों के बार-बार कहने पर उन्होंने मिट्टी की तीन गोलियों से गणेश आकृति बना दी. प्रतिमा इतनी सुंदर बनी कि धर्मेंद्र को खुद भी भरोसा नहीं हुआ. तभी उन्होंने ठान लिया कि वे इस कला को दूसरों तक पहुंचाएंगे.

पहली कार्यशाला से हजारों तक का सफर
धर्मेंद्र ने खंडवा की पहली मिट्टी गणेश कार्यशाला आयोजित की. हर साल गणेश चतुर्थी से 12–15 दिन पहले उनके घर पर यह कार्यशाला लगती है. रोजाना 200–300 बच्चे इसमें शामिल होते हैं. मिट्टी, उपकरण और प्रशिक्षण सब कुछ धर्मेंद्र खुद उपलब्ध कराते हैं.

बच्चे प्रतिमाएं बनाते हैं और जो अधूरी रह जाती हैं, उन्हें धर्मेंद्र और उनका परिवार मिलकर सुधारता है. बाद में पूरी टीम प्रतिमाओं को रंगकर जीवंत रूप देती है. रंगाई का काम संध्या दुबे, राशि सोनी, सिता गोयल समेत कई लोग करते हैं. वितरण का जिम्मा जेसीआई संस्था निभाती है.

सम्मान और पहचान
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने धर्मेंद्र के काम को सराहा और इसे धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मिसाल बताया. कोरोना काल में धर्मेंद्र ने डेढ़ सौ से ज्यादा प्रतिमाएं बांटीं और कई बार स्कूलों व कॉलेजों में जाकर वर्कशॉप भी की.

मिट्टी की प्रतिमाएं क्यों ज़रूरी?
धर्मेंद्र का मानना है कि पीओपी से बनी प्रतिमाएं पानी में नहीं घुलतीं और प्रदूषण फैलाती हैं. जबकि मिट्टी की प्रतिमाएं आसानी से घुल जाती हैं और प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचातीं. वे कहते हैं – “हर घर में मिट्टी की प्रतिमा होनी चाहिए, तभी हमारी संस्कृति और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहेंगे.”

आगे का सपना
धर्मेंद्र चाहते हैं कि यह कारवां अनवरत चलता रहे और प्रशासन भी इस दिशा में वर्कशॉप आयोजित करे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग पर्यावरण हितैषी मूर्तियों को अपनाएं.

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