अब ब्रेन को रीसेट करना संभव! डिप्रेशन-माइग्रेन सबकी छुट्टी, मेंटल हेल्थ में क्रांति ला रही ये थेरेपी?

World Mental health day: ‘कई बार तनाव, कोई पुरानी याद, चिंता या दिमाग में बार-बार घूमती किसी बात दुखी होकर लोग अक्सर सोचते हैं कि काश ऐसा होता कि दिमाग में भी रीसेट का बटन होता, तो दबाते ही सब मिट जाता और दिमाग भी फोन की तरह फिर से फ्रेश तरीके से काम करने लगता..’ आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह सोच अब हकीकत में बदल गई है. अब बेन को रीसेट किया जा सकता है, और यही वजह है कि अब तनाव, डिप्रेशन और माइग्रेन जैसी परेशानियां ही नहीं बल्कि सिजोफ्रेनिया जैसी बीमारियों को भी बिना सर्जरी के ठीक किया जा सकता है.

आज विश्व मानसिक दिवस पर हम आपको जाने-माने न्यूरोसाइकेट्रिस्ट डॉ. अमन नकवी के माध्यम से ब्रेन को रीसेट करने वाली इस न्यूरोमॉड्यूलेशन थेरेपी के बारे में बताने जा रहे हैं जो कई गंभीर मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज में क्रांति ला रही है. यह एक नॉन सर्जिकल और नॉन इन्वेसिक तकनीक है जो मस्तिष्क की कोशिकाओं को सक्रिय करके रोगों को ठीक करने में सक्षम है.

क्या है न्यूरोमॉड्यूलेशन, कैसे काम करती है?

डॉ. नकवी बताते हैं कि हमारा मस्तिष्क करोड़ों न्यूरॉन्स (तंत्रिका कोशिकाओं) का एक जाल है जो विद्युत संकेतों के जरिए आपस में बातचीत करते हैं. किसी बीमारी की स्थिति में, मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में यह संचार गड़बड़ा जाता है. कुछ न्यूरोन्स बहुत ज्यादा सक्रिया हो जाते हैं तो कुछ बहुत कम होते हैं. ऐसे में न्यूरोमॉड्यूलेशन थेरेपी एक रीसेट बटन की तरह काम करती है जो मस्तिष्क के उन्हीं चुनिंदा हिस्सों पर एक नियंत्रित, हल्की विद्युत या चुंबकीय तरंगें भेजकर उन न्यूरॉन्स को ट्यून करनी है या उनकी गतिविधि को संतुलित कर देत है.

यह तकनीक उन न्यूरोन्स को फिर से स्वस्थ तरीके से काम करना सिखाती है और ऐसा होने पर व्यक्ति की बीमारी कम होने लगती है. यह पूरी प्रक्रिया दर्द रहित होती है और मरीज होश में रहते हुए भी इसका उपचार ले सकता है.

न्यूरोमॉड्यूलेशन के क्या हैं तरीके?
डॉ. नकवी कहते हैं कि भारत के प्रमुख न्यूरोसाइंस संस्थानों और बड़े अस्पतालों में, विशेष रूप से TMS और tDCS जैसी न्यूरोमॉड्यूलेशन तकनीकें अब उपलब्ध हैं. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों में यह इलाज मरीजों को मिल रहा है और इसकी पहुंच तेजी से बढ़ रही है.

हैट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन (TMS) सबसे प्रमाणित तकनीक है. इसमें सिर के बाहर एक कुंडली (Coil) रखकर एक सेंटर्ड मेग्नेटिक फील्ड बनाया जाता है जो ब्रेन में हल्का करंटपैदा करके न्यूरॉन्स को सक्रिय करता है. अवसाद (डिप्रेशन) के इलाज के लिए यह पूरी दुनिया में मान्यता प्राप्त है.

वहीं ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन (tDCS) एक पोर्टेबल उपकरण है जो सिर पर लगे इलेक्ट्रोड के जरिए बहुत हल्का डायरेक्ट करंट देता है. इससे मस्तिष्क की कोशिकाओं की सक्रियता बढ़ती-घटती है, जिससे डिप्रेशन, सिजोफ्रेनिया जैसे रोगों में फायदा होता है.

इनके अलावा कुछ तकनीकें हैं जो आने वाले दिनों में भारत में देखने को मिलेंगी, उनमें ट्रांसक्रेनियल अल्टरनेटिंग करंट स्टिमुलेशन (tACS), ट्रांसक्रेनियल रैंडम नॉइज स्टिमुलेशन (tRNS), ट्रांसक्रेनियल अल्ट्रासाउंड स्टिमुलेशन (TUS), गैल्वेनिक वेस्टिबुलर स्टिमुलेशन (GVS), ट्रांसक्यूटेनियस वेगस नर्व स्टिमुलेशन (taVNS) आदि शामिल हैं.

सैकड़ों मरीजों के छूट गई लतें, डिप्रेशन और मिर्गी..
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज और हैलेट अस्पताल कानपुर में सीनियर न्यूरोसाइकेट्रिस्ट डॉ. अमन नकवी बताते हैं, ‘मैंने अपने करियर में सैकड़ों मरीजों का इलाज न्यूरोमॉड्यूलेशन थेरेपी से किया है. गंभीर अवसाद, OCD, शराब की लत, डिमेंशिया, मिर्गी और सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित मरीजों में परिणाम अत्यंत सकारात्मक रहे हैं. कई मरीज जो सालों से दवाइयां खाकर भी ठीक नहीं हुए थे, उन्होंने इस थेरेपी के बाद एक नई जिंदगी पाई है. यह उन मरीजों के लिए एक नई उम्मीद की किरण है, जिन्हें पारंपरिक इलाज से फायदा नहीं होता.’

डॉ. नकवी कहते हैं कि यह एक मेडिकल प्रक्रिया है जिसमें एनेस्थीसिया देकर मस्तिष्क में छोटा और कंट्रोल्ड करंट दिया जाता है.इससे एक छोटा दौरा (Seizure) पैदा होता है. यह प्रक्रिया मस्तिष्क के कैमिकल्स और उनके कनेक्शन को तेजी से दोबारा संतुलित करने में मदद करती है.

इन रोगियों के लिए विशेष फायदेमंद
यह विशेष रूप से गंभीर, दवा-प्रतिरोधी अवसाद, कैटाटोनिया (जहां रोगी हिलना-डुलना बंद कर दे), और सुसाइड करने का तीव्र खतरा जैसी गंभीर स्थितियों में एक जीवनरक्षक इलाज साबित हुई है, यह वह कंडीशन है जहां दवाएं या अन्य थेरेपी काम नहीं कर पातीं. तब यह फायदेमंद हैं.

पुराने करंट वाली थेरेपी से कितनी अलग
लोग अक्सर न्यूरोमॉड्यूलेशन को पुरानी ECT या ‘शॉक थेरेपी’ समझ लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है. ECT और न्यूरोमॉड्यूलेशन एक दूसरे के पूरक इलाज हैं. इनमें एक अंतर ये भी है कि काफी सीरियस और तत्काल रिस्क वाले मामलों में ECT एक शक्तिशाली उपाय है, जबकि न्यूरोमॉड्यूलेशन लंबे समय में बेहद कोमल और प्रभावी इलाज है. इसका फैसला एक अनुभवी मनोचिकित्सक रोगी की विशिष्ट स्थिति, लक्षणों की गंभीरता और जरूरतों के आधार पर करता है.

भ्रांतियां तोड़ें, नया इलाज अपनाएं

डॉ. नकवी लोगों को सलाह देते हैं कि मानसिक बीमारी एक मेडिकल कंडीशन है, यह कोई पागलपन या कमजोरी नहीं है. आज न्यूरोमॉड्यूलेशन जैसी आधुनिक तकनीकें आ गई हैं जो बिना सर्जरी के आसान इलाज दे रही हैं. ऐसे में समाज से इस कलंक को मिटाने की जरूरत है कि मेंटल हेल्थ में इलाज की जरूरत सिर्फ पागल लोगों को होती है. अगर आप या आपका कोई अपना लंबे समय से मानसिक रोग से जूझ रहा है, तो एक मनोचिकित्सक से संपर्क करें ताकि इन बीमारियों का इलाज हो सके और बेहतरीन जीवन जीया जा सके.

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