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Charan Paduka Singhpur Mela Chhatarpur: छतरपुर जिले में नौगांव जनपद के अंतर्गत आने वाले सिंहपुर गांव में एक ऐसा भी मेला लगता है, जो अंग्रेजों के जमाने से लग रहा है. लोग इस मेले से सालभर के लिए कपड़ा, किराना, बक्सा और दहेज का सामान भी खरीदकर रख लेते थे. यहां सोना-चांदी से लेकर हर तरह का सामान बिकता था. इस मेले में क्विंटलों सोना-चांदी उधार बेच दिया जाता था.
Charan Paduka Singhpur Mela: मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के नौगांव जनपद में बसे सिंहपुर गांव में लगने वाला चरण पादुका सिंहपुर मेला कोई साधारण मेला नहीं है. यह मेला अंग्रेजों के शासनकाल से लगातार लग रहा है और आज इसकी उम्र 150 साल से भी ज्यादा बताई जाती है. एक समय ऐसा था जब लोग इस एक ही मेले से पूरे साल के लिए कपड़ा, किराना, बक्सा और यहां तक कि दहेज का सामान भी खरीद लेते थे.
राजा भवानी सिंह के जन्म से जुड़ी है शुरुआत
सिंहपुर गांव के सरपंच पति रुद्र प्रताप उर्फ बॉबी तिवारी बताते हैं कि इस मेले की शुरुआत राजा भवानी सिंह के जन्म के समय हुई थी. तभी से यह मेला हर साल लगता आ रहा है. समय बदला, हालात बदले, लेकिन मेला आज भी अपने अस्तित्व को संभाले हुए है. हालांकि, अब जगह बदल जाने के कारण मेला पहले जितना विशाल नहीं रह गया है.
जब जिले में सिर्फ तीन ही मेले लगते थे
एक दौर ऐसा भी था जब पूरे छतरपुर जिले में सिर्फ तीन बड़े मेले लगते थे छतरपुर का जलविहार मेला, महाराजपुर के कुम्हेड़ा गांव का मेला और सिंहपुर का यह प्रसिद्ध मेला. कुम्हेड़ा में दो दिन मेला लगने के बाद वही मेला चरण पादुका सिंहपुर पहुंचता था, जहां पूरे 10 दिनों तक रौनक रहती थी.
सोना-चांदी की दुकानों पर तैनात रहती थी फोर्स
स्थानीय 60 वर्षीय बुजुर्ग बताते हैं कि इस मेले में छतरपुर और राजनगर के सर्राफा व्यापारी सोना-चांदी लेकर आते थे. कारोबार इतना बड़ा होता था कि व्यापारियों की सुरक्षा के लिए बाकायदा पुलिस फोर्स तैनात की जाती थी. यहां सोना-चांदी खुलेआम बिकता था और लोग भरोसे के आधार पर उधार भी ले जाते थे.
अंग्रेज अफसर भी देखने आते थे मेला
87 वर्षीय बुजुर्ग याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने अपने बचपन में अंग्रेज अफसरों को इस मेले में घूमते देखा है. मेला देखने अंग्रेज अधिकारी भी आते थे. उस दौर में यह मेला पूरे इलाके की शान माना जाता था.
क्विंटलों सोना उधार, अगले साल हिसाब
लवकुश नगर निवासी महेश पाटकार बताते हैं कि यह मेला सिर्फ खरीदारी नहीं, भरोसे का भी प्रतीक था. यहां क्विंटलों के हिसाब से सोना-चांदी उधार बेचा जाता था और अगले साल इसी मेले में ब्याज के साथ हिसाब होता था. वे खुद भी वर्षों से यहां कपड़े की दुकान लगा रहे हैं.
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Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें
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