21 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल
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भारत सरकार सौर उर्जा को बढ़ावा देने के लिए ‘प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ चला रही है। इसके तहत फाइनेंशियल ईयर 2026-27 तक देश के एक करोड़ घरों में रूफटॉप सोलर पैनल लगाने का लक्ष्य रखा गया है।
दिसंबर, 2025 तक के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में अब तक 19 लाख से ज्यादा सोलर सिस्टम लगाए जा चुके हैं। इनमें से करीब 7.7 लाख घर ऐसे हैं, जिनका बिजली बिल अब जीरो हो चुका है।
सरकार इस योजना को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए सब्सिडी, आसान लोन और नेट मीटरिंग जैसी सुविधाएं दे रही है। इसके बावजूद बहुत से लोगों को सोलर पैनल इंस्टालेशन की प्रक्रिया, इसके बेनिफिट्स और सब्सिडी के बारे में सही जानकारी नहीं है।
तो चलिए, आज जरूरत की खबर में हम रूफटॉप सोलर पैनल इंस्टालेशन प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
- सोलर पैनल के लिए आवेदन कैसे करें?
- सोलर पैनल लगाने पर सरकार कितनी सब्सिडी देती है और ये कैसे मिलती है?
एक्सपर्ट: आलोक पाण्डेय, सोलर प्रोजेक्ट इंजीनियर, गुजरात
सवाल- सोलर पैनल क्या है?
जवाब- सोलर पैनल एक ऐसा उपकरण है, जो सूरज की रोशनी को बिजली में बदलता है। यह खास सोलर सेल्स से बना होता है, जो धूप पड़ते ही बिजली पैदा करते हैं। इस बिजली का इस्तेमाल घर के पंखे, लाइट, टीवी और अन्य उपकरण चलाने में किया जा सकता है। सोलर पैनल से बनी बिजली पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित है। यह बिजली बिल कम करती है और लंबे समय में घर को बिजली के मामले में आत्मनिर्भर बनाती है।
सवाल- सोलर पैनल कैसे काम करता है?
जवाब- जब धूप सोलर पैनल पर पड़ती है तो उसमें लगे सोलर सेल्स (फोटोवोल्टिक सेल) सक्रिय हो जाते हैं। ये सूर्य के प्रकाश (फोटॉन) की ऊर्जा को सीधे बिजली (इलेक्ट्रॉन) में बदलते हैं। इस प्रक्रिया फोटोवोल्टिक इफेक्ट कहते हैं। इलेक्ट्रॉन से डायरेक्ट करंट (DC) बिजली बनती है।
यह DC इन्वर्टर के जरिए अल्टरनेटिंग करंट (AC) में बदली जाती है, जिसे घर में इस्तेमाल करते हैं। जरूरत से ज्यादा बनी बिजली ग्रिड में भेजी जा सकती है या बैटरी में स्टोर की जाती है। इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए-

सवाल- सोलर पैनल से कितनी बिजली बचाई जा सकती है?
जवाब- यह सिस्टम की क्षमता, धूप की उपलब्धता और बिजली खपत पर निर्भर है। आमतौर पर 1 किलोवाट (kW) का सोलर सिस्टम हर महीने करीब 120–150 यूनिट बिजली बना लेता है। यानी अगर घर में 3 किलोवाट का सोलर सिस्टम लगाया जाए तो वह महीने में लगभग 350–450 यूनिट तक बिजली पैदा कर सकता है। इससे सामान्य घर का 60 से 100% तक बिजली बिल कम हो सकता है।
सवाल- सोलर पैनल लगाने में कितना खर्च आता है?
जवाब- इसका खर्च सिस्टम की क्षमता (जैसे 1, 2, 3 किलोवाट), पैनल और इन्वर्टर की क्वालिटी व इंस्टालेशन चार्जेस पर निर्भर है। हालांकि सरकार इसके इंस्टॉलेशन पर सब्सिडी भी देती है। इससे लागत थोड़ी कम हो जाती है। इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए-

सवाल- रूफटॉप सोलर पैनल के लिए आवेदन कैसे करें?
जवाब- इसके लिए नेशनल सोलर पोर्टल (pmsuryaghar.gov.in) पर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करें। इसमें बिजली कनेक्शन नंबर, मोबाइल नंबर और आधार जैसी बुनियादी जानकारी देनी होती है।
रजिस्ट्रेशन के बाद अपने क्षेत्र के DISCOM (डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी) और ‘सौर उर्जा मंत्रालय’ द्वारा अप्रूव्ड वेंडर का चयन करें। वेंडर साइट सर्वे करेगा, सिस्टम इंस्टॉल करेगा। नीचे दिए ग्राफिक से इसकी प्रक्रिया समझिए-

सवाल- सोलर पैनल आवेदन करने के लिए किन डॉक्यूमेंट्स की जरूरत होती है?
जवाब- इसके लिए आपके पास कुछ डॉक्यूमेंट्स होने जरूरी हैं। इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए-

सवाल- घर पर सोलर पैनल लगाने के लिए कितनी जगह चाहिए होती है?
जवाब- यह सोलर सिस्टम की क्षमता पर निर्भर करता है। औसतन 1 किलोवाट के लिए करीब 90 से 120 वर्गफुट छत की जरूरत होती है। यानी अगर आप 3 किलोवाट के लिए लगभग 270 से 360 वर्गफुट खुली और धूप वाली जगह चाहिए। बेहतर रिजल्ट के लिए यह जगह दक्षिण दिशा की ओर होनी चाहिए।
सवाल- क्या सोलर पैनल को किसी भी छत पर लगाया जा सकता है?
जवाब- हां, इसे कंक्रीट की सपाट छत, ढलानदार छत और मजबूत टिन शेड, किसी पर भी लगाया जा सकता है। हालांकि छत पर दिनभर अच्छी धूप आना जरूरी है। छत पर पेड़, पानी की टंकी या आसपास की इमारतों की छाया नहीं पड़नी चाहिए।
सवाल- सोलर पैनल लगाने पर सरकार कितनी सब्सिडी देती है और ये कैसे मिलती है?
जवाब- केंद्र सरकार 3 किलोवाट तक के रूफटॉप सोलर सिस्टम पर अधिकतम 78,000 रुपए तक की सब्सिडी देती है। इसके लिए सोलर पैनल इंस्टालेशन के बाद नेशनल रूफटॉप सोलर पोर्टल (pmsuryaghar.gov.in) पर सब्सिडी रिक्वेस्ट डालनी होती है। रिक्वेस्ट के एक महीने के भीतर खाते में सब्सिडी आ जाती है।
सवाल- कितने साल में सोलर पैनल का पैसा वसूल हो जाता है?
जवाब- यह इस बात पर निर्भर है कि आपके घर की बिजली खपत कितनी है और आपको कितनी सब्सिडी मिली है।
उदाहरण के तौर पर, 3 किलोवाट का सोलर सिस्टम सब्सिडी के बाद लगभग 75,000 रुपए में पड़ता है। अगर हर महीने 2,000–2,500 रुपए की बिजली बचत होती है तो ढाई–तीन साल में लागत निकल जाती है। इसके बाद अगले 15–20 साल तक बिजली लगभग मुफ्त मिलती है।

सवाल- सोलर पैनल सूरज की रोशनी से काम करता है तो क्या बारिश, बादल या सर्दियों के सीजन में इसका यूज कम हो जाता है?
जवाब- बारिश, बादल या सर्दियों में बिजली उत्पादन क्षमता कुछ हद तक कम जरूर होती है, लेकिन यह पूरी तरह बंद नहीं होती। बादलों में भी सोलर पैनल 60–80% तक बिजली बना लेते हैं। इसे सालभर के औसत उत्पादन को ध्यान में रखकर ही डिजाइन किया जाता है।
सवाल- एक बार सोलर पैनल लगवाने के बाद यह कितने समय तक चलता है?
जवाब- सोलर प्रोजेक्ट इंजीनियर आलोक पांडेय बताते हैं कि आमतौर पर सोलर पैनल 25-30 साल तक काम करता है। इस दौरान इसकी बिजली बनाने की क्षमता धीरे-धीरे कम होती है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होती। ज्यादातर सोलर पैनलों पर 25 साल की परफॉर्मेंस वारंटी मिलती है, जबकि इन्वर्टर की उम्र 8–12 साल होती है। रेगुलर मेंटेनेंस से सोलर सिस्टम लंबे समय तक चलता रहता है।
सवाल- सोलर पैनल की मेंटेनेंस कितने दिनों में करवानी होती है और इसमें कितना खर्च आता है?
जवाब- आलोक पांडेय बताते हैं कि हर 3-6 महीने में पैनलों की सफाई करानी चाहिए। साथ ही साल में एक बार सिस्टम की तकनीकी जांच (वायरिंग, इन्वर्टर, अर्थिंग) भी कराना चाहिए। खर्च की बात करें तो घरेलू सोलर सिस्टम की मेंटेनेंस पर सालाना लगभग 1 से तीन हजार तक का खर्च आता है। कई कंपनियां पहले 1–2 साल तक मुफ्त मेंटेनेंस भी देती हैं।
सवाल- कैसे पता करें कि घर में कितने किलोवाट का सोलर सिस्टम लगवाना सही है?
जवाब- 1 किलोवाट का सोलर सिस्टम महीने में 120–150 यूनिट बिजली बनाता है। अगर हर महीने करीब 300 यूनिट बिजली की खपत होती है तो 3 किलोवाट का सोलर सिस्टम उपयुक्त रहेगा। इसके अलावा रूफटॉप स्पेस, धूप की स्थिति और भविष्य की जरूरतों का भी ध्यान रखना चाहिए।
सवाल- क्या सोलर पैनल से बनी बिजली को बेच भी सकते हैं, इसकी क्या प्रक्रिया है?
जवाब- हां, यह सुविधा ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम में ही मिलती है। इसके लिए नेट मीटरिंग की प्रक्रिया होती है। जब घर में जरूरत से ज्यादा बिजली बनती है तो वह अपने आप ग्रिड में चली जाती है। बदले में DISCOM यूनिट का क्रेडिट देता है, जो बिजली बिल में एडजस्ट हो जाता है। इसके लिए नेशनल रूफटॉप सोलर पोर्टल पर आवेदन, DISCOM की मंजूरी और बाय-डायरेक्शनल (नेट) मीटर लगवाना जरूरी होता है।
सवाल- ऑन-ग्रिड, ऑफ-ग्रिड और हाइब्रिड सोलर सिस्टम में क्या फर्क है?
जवाब- ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम बिजली ग्रिड से जुड़ा होता है। इसमें बिना बैटरी के सोलर से बनी बिजली सीधे घर में इस्तेमाल होती है और अतिरिक्त बिजली ग्रिड में भेज दी जाती है। इससे बिजली बिल कम या शून्य हो जाता है, लेकिन पावर कट के समय यह काम नहीं करता है।
ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम ग्रिड से जुड़ा नहीं होता और इसमें बैटरी लगी होती है। सोलर से बनी बिजली बैटरी में स्टोर होकर जरूरत के समय काम आती है। यह पावर कट में भी चलता है, लेकिन इसकी लागत ज्यादा होती है।
हाइब्रिड सोलर सिस्टम में ऑन-ग्रिड और ऑफ-ग्रिड दोनों के फायदे होते हैं। इसमें ग्रिड कनेक्शन भी होता है और बैटरी बैकअप भी, जिससे बिजली बचत के साथ-साथ पावर कट में सप्लाई मिलती रहती है।
सवाल- नेट मीटरिंग क्या होती है और इससे उपभोक्ता को क्या फायदा होता है?
जवाब- नेट मीटरिंग एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें सोलर सिस्टम से बनी अतिरिक्त बिजली ग्रिड में चली जाती है और उसका क्रेडिट उपभोक्ता को मिलता है। इससे बिजली बिल कम होता है और कई मामलों में बिल शून्य भी हो जाता है।
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