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Sidhi News: डॉ विपिन सिंह ने लोकल 18 से कहा कि अगर किसी व्यक्ति को लगातार तीन हफ्ते तक रोजाना निर्गुंडी के पत्तों से झलकी यानी हवा दी जाए, तो पक्षाघात के लक्षणों में धीरे-धीरे सुधार देखा जा सकता है. यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी दवा के प्राकृतिक तरीके से पूरी की जाती है.
सीधी. मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अनेक दुर्लभ औषधीय पौधे भी पाए जाते हैं. इन्हीं में से एक है निर्गुंडी, जिसे स्थानीय लोग संजीवनी बूटी के समान मानते हैं. छुहिया घाटी में आसानी से मिलने वाला यह पौधा ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा बना हुआ है. सीधी के आयुर्वेद चिकित्साधिकारी डॉ विपिन सिंह ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए बताया कि इसके पत्तों में कई औषधीय गुण मौजूद हैं, जिनका उपयोग वर्षों से विभिन्न बीमारियों के उपचार में किया जाता रहा है. विशेष रूप से पक्षाघात (पैरालिसिस) जैसी गंभीर बीमारी में इसका पारंपरिक उपयोग उल्लेखनीय माना जाता है.
डॉ सिंह के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को लगातार तीन सप्ताह तक रोजाना निर्गुंडी के पत्तों से झलकी यानी हवा दी जाए, तो पक्षाघात के लक्षणों में धीरे-धीरे सुधार देखा जा सकता है. यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी दवा के प्राकृतिक तरीके से की जाती है. इसमें रोगी के प्रभावित अंगों पर निर्गुंडी के पत्तों से नियमित रूप से हवा दी जाती है. स्थानीय लोगों का मानना है कि इस विधि से शरीर की नसों में संचार बेहतर होता है और जकड़न में राहत मिलती है. हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इस दावे की पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई है लेकिन ग्रामीण अंचलों में इसके सकारात्मक परिणामों की कई कहानियां सुनने को मिलती हैं. आयुर्वेदिक दृष्टि से देखें, तो निर्गुंडी के पत्तों में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल और दर्द निवारक गुण पाए जाते हैं. यही कारण है कि इसका उपयोग सूजन, जोड़ों के दर्द, संक्रमण और अन्य शारीरिक पीड़ा में किया जाता है. कई आयुर्वेदिक औषधियों में भी इसे प्रमुख घटक के रूप में शामिल किया जाता है.
बीमारियों में निर्गुंडी का पारंपरिक उपयोग
उन्होंने कहा कि इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्रों में बच्चों में होने वाली छोटी माता यानी चेचक जैसी बीमारियों में भी निर्गुंडी का पारंपरिक उपयोग किया जाता है. इस दौरान बच्चों को इसके पत्तों से झलकी दी जाती है, जिससे उन्हें राहत मिलती है. स्थानीय महिलाएं निर्गुंडी के पत्तों से आंगन की सफाई भी करती हैं. उनका मानना है कि इससे वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. डॉ विपिन सिंह ने आगे कहा कि छुहिया घाटी में इसे एक तरह से आध्यात्मिक और औषधीय दोनों ही दृष्टिकोण से उपयोग में लाया जाता है. हालांकि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में अभी इसकी पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई है लेकिन पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अनुभव इस पौधे को चमत्कारी मानते हैं.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.