कचरे से कमाई का कमाल: रद्दी कागज से शुरू किया काम, कई महिलाओं को दे रही रोजगार

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Bhilwara News Hindi: एक साधारण से आइडिया ने एक महिला की जिंदगी बदल दी. कागज की रद्दी से शुरू किया गया छोटा सा काम आज सफल बिजनेस में बदल चुका है. इस पहल से महिला न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनी है, बल्कि आसपास की कई अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही है. रीसायकल पेपर से उत्पाद तैयार कर वह अच्छी आय अर्जित कर रही हैं. उनकी यह सफलता कहानी महिला सशक्तिकरण और स्वरोजगार की प्रेरणादायक मिसाल बन गई है, जो दिखाती है कि छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं.

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भीलवाड़ा: अगर व्यक्ति अपने लक्ष्य को हासिल करने का मन बना ले, तो तमाम चुनौतियां भी उसकी राह नहीं रोक सकती हैं. आमतौर पर देखा जाता है कि अखबार सुबह-सुबह पढ़ने के कुछ समय बाद ही रद्दी बन जाता है और बाद में इस अखबार का कोई मोल नहीं रहता है लेकिन एक छोटे से गांव की रहने वाली महिला ने इस अखबार की रद्दी को सोने में बदल दिया है. और इसका व्यापार करके अब महिला न केवल आत्मनिर्भर बन गई है बल्कि अन्य महिलाओं को रोजगार दे रही है अंजू मेघवाल पुराने अखबार की रद्दी से कई हैंडमेड प्रोडक्ट बना रही है जिनकी डिमांड पूरे राजस्थान प्रदेश बारे में हो रही है और इसी की बदौलत वह मोटा मुनाफा कमा रही है.

अंजु मेघवाल ने लोकल 18 के साथ खास बातचीत करते हुए बताया कि पहले हम भी एक आम ग्रहणी महिला की तरह घर पर ही रहती थी और घर का ही काम करती थी.  लेकिन बाद में सोचा कि घरबार चलाने के लिए कुछ खुद का बिजनेस करना चाहिए तो बाद में राजीविका के माध्यम से जोड़ी और  इसके जरिए हमने पुराने अखबार के रद्दी पेपर से प्रोडक्ट बनाने की ट्रेनिंग ली और बाद में हमको यह काम पूरी तरीके से समझ में आने लग गया और बाद में हमने इससे काम करना शुरू कर दिया. और धीरे-धीरे हमने पुराने अखबार की रद्दी से अलग-अलग प्रोडक्ट बनाना शुरू कर दिया. पहले हमने यह कार्य छोटा लेवल पर शुरू किया वह जैसे-जैसे इसकी डिमांड बढ़ने लगी तो हमने अपना काम को आगे बढ़ाया हैं.

काम की वजह से आत्मनिर्भर बन रही
इन बैगों की खासियत यह है कि ये पूरी तरह हाथ से बनाए जाते हैं.  पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और देखने में भी बेहद खूबसूरत लगते हैं. इसी वजह से इनकी मांग न सिर्फ स्थानीय स्तर पर बल्कि देशभर में बढ़ने लगी समय के साथ अखबार को रद्दी से हम लैपटॉप बैग, टोट बैग और शगुन लिफाफे , गोगल बैक और अलग-अलग प्रकार के बैग बनाते हैं. इसकी डिमांड राजस्थान ही नहीं बल्कि दिल्ली गुजरात उत्तर प्रदेश शाहिद पूरे इंडिया में हो रही है. इस काम को लेकर मैंने अपने साथ 30 से ज्यादा महिलाओं को प्रशिक्षण देकर अपने साथ जोड़ लिया है. आज ये महिलाएं पेपर फैब्रिक तैयार करने से लेकर बैग बनाने तक हर काम में माहिर हैं और इससे उनकी आमदनी भी बढ़ी है. गांव की कई महिलाएं इस काम की वजह से आत्मनिर्भर बन रही हैं.

इको फ्रेंडली होते हैं यह बैग
अंजू मेघवाल ने बताया कि हाथ से बनाए जाने वाले इन बैगों की कीमत 50 रुपये से शुरू होकर डिजाइन के अनुसार 2000 रुपये तक पहुंचती है. यह पूरी तरीके से इको फ्रेंडली होते हैं इनमें किसी भी प्रकार से केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. वह यह नेचर के करीब होते हैं. इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है.

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Jagriti Dubey

With more than 6 years above of experience in Digital Media Journalism. Currently I am working as a Content Editor at News 18 in Rajasthan Team. Here, I am covering lifestyle, health, beauty, fashion, religion…और पढ़ें

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