प्रदेश में आने वाले दिनों में सरकारी भवनों के निर्माण में 3 डी प्रिंटिंग का उपयोग किया जा सकता है। खासतौर पर सिंहस्थ जैसे बड़े आयोजनों में जब तेजी से भवनों के निर्माण की जरूरत होगी तो इसे लागू किया जा सकता है। इस तकनीक में कंप्यूटर पर भवन का डिजिटल डिज़ाइन तैयार किए जाने के बाद विशेष मशीनों से कांक्रीट या अन्य निर्माण सामग्री को परत-दर-परत प्रिंट कर संरचना का निर्माण किया जाता है। इसमें ईंट, शटरिंग और पारंपरिक ढलाई की जरूरत अत्यंत कम हो जाती है, जिससे कंसट्रक्शन अधिक तेज़ी से, सटीक और नियंत्रित बनता है। लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने बुधवार को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास में 3D प्रिंटिंग आधारित भवन निर्माण तकनीक का अवलोकन किया। लोक निर्माण मंत्री सिंह ने कहा कि 3D प्रिंटिंग तकनीक से भवन निर्माण में न सिर्फ तेजी आएगी बल्कि गुणवत्ता भी बेहतर होगी। वर्ष 2028 में उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ कुंभ मेले जैसे विशाल आयोजनों में जहां परिस्थितियों के अनुरूप तीव्र गति से भवन निर्माण की जरूरत होती है वहां 3D प्रिंटिंग आधारित निर्माण तकनीक बहुत कारगर सिद्ध हो सकती है। बेस्ट प्रैक्टिसेस लागू करने हर संभव प्रयास मंत्री सिंह ने यह भी बताया कि लोक निर्माण विभाग नई तकनीकों, नवाचारों और बेस्ट प्रैक्टिसेज को प्रदेश में लागू करने के लिए हर स्तर पर प्रयास कर रहा है। इसी क्रम में आईआईटी मद्रास की यह अध्ययन यात्रा आयोजित की गई है। उन्होंने जानकारी दी कि इससे पूर्व लोक निर्माण विभाग के प्रतिनिधिमंडल द्वारा गुजरात, तेलंगाना और महाराष्ट्र में भी नई निर्माण तकनीकों और आधुनिक कार्य प्रणालियों का अध्ययन किया जा चुका है। गुजरात अध्ययन यात्रा का नेतृत्व स्वयं मंत्री सिंह ने किया था। इसलिए अलग महत्व रखता है 3 डी प्रिंटिंग मंत्री सिंह ने बताया कि 3D प्रिंटिंग, जिसे एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग भी कहा जाता है, पारंपरिक निर्माण पद्धतियों से भिन्न है। इसमें पहले कंप्यूटर पर भवन का डिजिटल डिजाइन किया जाता है और फिर विशेष मशीनों द्वारा कांक्रीट या अन्य निर्माण सामग्री को परत-दर-परत प्रिंट कर संरचना का निर्माण किया जाता है। इस प्रक्रिया में ईंट, शटरिंग और पारंपरिक ढलाई की आवश्यकता अत्यंत कम हो जाती है, जिससे निर्माण अधिक तेज़, सटीक और नियंत्रित बनता है। मंत्री सिंह कहा कि जहां पारंपरिक निर्माण में महीनों का समय लगता है, वहीं 3D प्रिंटिंग तकनीक से कई संरचनाएं कुछ ही दिनों में तैयार की जा सकती हैं। मौसम, श्रमिक उपलब्धता और शटरिंग जैसी बाधाओं का इस तकनीक पर सीमित प्रभाव पड़ता है। आपदा-प्रभावित क्षेत्रों, आपातकालीन आवास, स्कूल तथा स्वास्थ्य संरचना जैसे कार्यों में यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकती है। मानवीय गलतियां कम होने की संभावना
डिजिटल डिज़ाइन आधारित निर्माण से यूनिफॉर्म क्वालिटी, उच्च सटीकता और बेहतर स्ट्रक्चरल स्ट्रेंथ सुनिश्चित होती है, साथ ही मानवीय त्रुटियों की संभावना भी कम होती है। यह भी स्पष्ट किया गया कि वर्तमान में यह तकनीक हर प्रकार के निर्माण का पूर्ण विकल्प नहीं है। इसे अपनाने के लिए पायलट प्रोजेक्ट, इंजीनियरों की विशेष ट्रेनिंग तथा तकनीकी संस्थानों और स्टार्ट-अप्स के साथ समन्वय आवश्यक होगा। मंत्री सिंह ने यह भी कहा कि आने वाले समय में देश के अन्य तकनीकी संस्थानों और राज्यों में भी इस प्रकार की अध्ययन यात्राएं आयोजित की जाएंगी ताकि नई तकनीकों को समझकर उन्हें प्रदेश की आवश्यकताओं के अनुरूप चरणबद्ध और सुरक्षित तरीके से लागू किया जा सके। सड़क सुरक्षा की नई तकनीकों को भी समझा
अध्ययन यात्रा के दौरान मंत्री ने सड़क सुरक्षा से जुड़ी नई तकनीकों तथा डेटा ड्रिवन हाइपरलोकल आधारित कार्य प्रणालियों का भी अवलोकन किया। सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम, ब्लैक स्पॉट विश्लेषण और डेटा आधारित निर्णय प्रणाली पर विशेषज्ञों के साथ विस्तार से चर्चा की गई। इस अवसर पर आईआईटी मद्रास के सड़क सुरक्षा प्रभाग के प्रमुख प्रोफेसर वेंकटेश बालासुब्रह्मण्यम एवं इंजीनियरिंग डिज़ाइन प्रभाग के प्रमुख प्रोफेसर जयकांथन के साथ उभरती तकनीकों, इंजीनियरिंग नवाचार और सड़क सुरक्षा पर सार्थक संवाद हुआ। चर्चा में प्रबंध संचालक भवन विकास निगम एम सिबी चक्रवर्ती, प्रमुख अभियंता (भवन) लोक निर्माण विभाग सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित रहे। .