जब अस्पताल की कुर्सी पर बैठा मरीज दिल में डर और मन में ढेरों सवाल लिए डॉक्टर का इंतजार करता है, तब उसे सिर्फ दवा की पर्ची नहीं चाहिए होती. उसे चाहिए होता है भरोसा, साफ बात और यह एहसास कि कोई उसे ध्यान से सुन रहा है. अब तक यह माना जाता था कि बड़ी डिग्री और लंबा अनुभव ही अच्छे डॉक्टर की पहचान हैं, लेकिन समय के साथ यह सोच बदल रही है. हाल ही में एक नई स्टडी सामने आई है, जो बताती है कि भारतीय मरीजों की नजर में ‘गुड डॉक्टर’ वही है जो इलाज के साथ इंसानियत, समझदारी और संवाद को भी उतनी ही अहमियत देता है जितना इलाज को.
नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया (NMJI) में प्रकाशित इस स्टडी ने भारतीय मरीजों की इस बदलती सोच को सामने रखा है. इस स्टडी का नाम है “The Good Indian Doctor: People’s Perspectives”, जिसमें 402 लोगों से बातचीत की गई. यह रिसर्च कर्नाटक के मंगलुरु स्थित KS Hegde Medical Academy और तमिलनाडु के Christian Medical College, Vellore के जनरल सर्जरी विभाग द्वारा की गई. नतीजे चौंकाने वाले हैं, क्योंकि इसमें यह बात सामने आई है कि आज का मरीज डॉक्टर की स्किल को जरूरी मानते हैं, लेकिन सिर्फ एक्सपर्ट होना अब काफी नहीं है.
मरीज क्या चाहते हैं अपने डॉक्टर से?
स्टडी के मुताबिक, ज्यादातर लोगों की पहली उम्मीद यह है कि डॉक्टर उनकी बीमारी और इलाज को आसान भाषा में समझाए. 402 में से 273 लोगों ने कहा कि बीमारी की साफ और स्पष्ट जानकारी उनके लिए सबसे जरूरी है. वहीं, 218 लोगों ने डॉक्टर की ईमानदारी को दूसरी सबसे अहम खूबी बताया. इसका मतलब साफ है कि मरीज अब सिर्फ दवाइयां नहीं चाहते, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि उन्हें क्या हुआ है, इलाज के क्या विकल्प हैं और आगे क्या हो सकता है.
इंटरनेट ने बढ़ाई जानकारी, साथ ही डर भी
दिल्ली के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विकास चोपड़ा(Dr Vikas Chopra, Prominent interventional cardiologist, Primus Hospital, Delhi) का कहना है कि आजकल मरीज दो तरह के होते हैं. कुछ मरीज डर के मारे सवाल नहीं पूछते, उन्हें लगता है कि डॉक्टर नाराज हो जाएंगे. वहीं कुछ लोग इंटरनेट से प्रिंटआउट लेकर आते हैं और कहते हैं कि उन्हें दिल की गंभीर बीमारी है.
डॉ. चोपड़ा का कहना है कि इंटरनेट ने लोगों को जागरूक तो किया है, लेकिन साथ ही उनकी चिंता भी बढ़ा दी है. उन्होंने कहा,“अक्सर लोग गूगल पर लक्षण खोजते हैं और उन्हें लगता है कि उन्हें कैंसर या हार्ट डिजीज है. ऐसे में डॉक्टर का पहला काम बीमारी से पहले मरीज के डर को शांत करना होता है.”
बेहतर व्यवहार को देते हैं अहमियत
दिल्ली के माता चानन देवी अस्पताल में यूरोलॉजिस्ट डॉ. निरुपम अदलखा(Dr. Nirupam Adlakha, urologist, Mata Chanan Devi Hospital, Delhi) का मानना है कि आज मरीज सबसे ज्यादा सम्मान और भरोसा चाहते हैं. “मेरे फील्ड में मरीजों को इलाज से ज्यादा आश्वासन चाहिए होता है. लेकिन यह बात सिर्फ मेडिकल नहीं, हर सर्विस सेक्टर पर लागू होती है.” NMJI की स्टडी भी यही बताती है कि मरीज चाहे इंटरनेट से डरकर आए हों या जानकारी की कमी के कारण चुप हों, आखिर में वे एक ही बात चाहते हैं, सम्मान, धैर्य और इंसानी व्यवहार.
‘डॉक्टर का फैसला’ नहीं, अब ‘साझा फैसला’
स्टडी का सबसे अहम बात यह सामने आती है कि भारत में मरीजों की सोच बदल रही है. अब लोग सिर्फ डॉक्टर के फैसले पर आंख बंद कर भरोसा नहीं करना चाहते, बल्कि इलाज से जुड़े फैसलों में भागीदारी चाहते हैं. इसे ही कहा गया है साझा फैसला(shared decision-making). रिसर्च के मुताबिक, खुली और ईमानदार बातचीत डॉक्टर और मरीज के रिश्ते में भरोसा बढ़ाती है. यह भरोसा तभी बनता है, जब डॉक्टर प्रोफेशनल स्किल के साथ-साथ इंसानियत भी दिखाए.
‘गुड डॉक्टर’ की नई परिभाषा
डॉ. विकास चोपड़ा के अनुसार, लोग हमारे पास भारी-भरकम शब्द सुनने नहीं आते. वे साफ जवाब और सुकून चाहते हैं. अगर हम उन्हें यह दे सकें, तो आधा इलाज वहीं हो जाता है. इस तरह यह स्टडी साफ संकेत देती है कि आज के भारत में एक अच्छा डॉक्टर वही है जो सुने, समझाए, सच बोले और इंसान की तरह पेश आए. डिग्री और अनुभव जरूरी हैं, लेकिन उनके साथ संवेदनशीलता, सम्मान और भरोसा भी उतना ही अहम हो गया है.