मेंटल हेल्थ– मैं किसी को NO नहीं बोल पाता: अपनी जरूरतें नहीं कह पाता, सब मुझे कंट्रोल और डॉमिनेट करते हैं, मैं क्या करूं

12 मिनट पहले

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सवाल– मैं एक 30 साल का वर्किंग प्रोफेशनल हूं। मेरी गर्लफ्रेंड के साथ यूं तो मेरे रिश्ते ठीकठाक हैं, लेकिन कुछ चैलेंज भी है। उसकी शिकायत ये है कि मैं अपनी कोई इच्छा या जरूरत व्यक्त नहीं करता। मैं ये बात जानता हूं कि अपनी फीलिंग्स से लेकर नीड्स तक कुछ भी जाहिर करने में मुझे बहुत परेशानी होती है। घर के हालात कुछ ऐसे थे कि मैं अपने मम्मी-पापा के साथ नहीं रह पाया। मैं बचपन से अपने रिश्तेदारों के घर पर ही पला। शायद उस कारण ऐसा हुआ होगा कि मैंने बचपन से ही अपनी फीलिंग्स को दबाना और अपनी जरूरतें जाहिर न करना सीख लिया। लेकिन अब तो मैं न बच्चा हूं और न ही रिश्तेदारों के रहमोकरम पर हूं। फिर भी मुझे अपनी जरूरतें जाहिर करने में परेशानी होती है। ये इस हद तक है कि अगर मैं सोना चाहता हूं और कोई मुझसे बोले कि मेरे साथ मार्केट चलो तो मैं ये भी नहीं कह पाता कि नहीं, अभी मेरा सोने का मन है। मैं अपनी कोई इच्छा, कोई जरूरत एक्सप्रेस ही नहीं कर पाता। मुझे लगता है कि पर्सनल और प्रोफेशनल स्पेस में सब मुझे कंट्रोल और डॉमिनेट करते हैं। मुझे लगने लगा है कि मेरी मेंटल हेल्थ पर इसका नेगेटिव असर पड़ रहा है। हर बार खुद को दबाने, न कह पाने के बाद मैं एक अजीब सा अवसाद महसूस करता हूं। प्लीज मेरी हेल्प करिए। मैं क्या करूं, अपने मन की कैसे सुनूं।

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। न सिर्फ आपका सवाल बहुत जरूरी और वाजिब है, जैसाकि आपके सवाल से जाहिर है, आप अपने एडल्ट व्यवहार के रूट कॉज को भी काफी हद तक समझ पा रहे हैं। आपने ये भी साफ लिखा है कि आपका बचपन ऐसे माहौल में बीता, जहां अपनी भावनाओं को, जरूरतों को एक्सप्रेस करने की जगह नहीं थी। छुटपन में आपने जो चीजें एक कोपिंग मैकेनिज्म की तरह एडॉप्ट कीं, अब वो एडल्ट लाइफ में इनर वायरिंग बन गई हैं। बड़े होने पर भी वही पैटर्न जारी है, जबकि अब आप न छोटे बच्चे हैं और न ही किसी एडल्ट पर निर्भर हैं।

आगे हम इस व्यवहार के मूल कारणों के साथ-साथ सेल्फ हेल्प के तरीकों के बारे में डिटेल में बात करेंगे।

अपनी जरूरतें और भावनाएं व्यक्त करना क्यों जरूरी है?

बहुत से लोग ऐसे माहौल में बड़े होते हैं, जहां उनकी भावनाओं और जरूरतों को महत्व नहीं दिया जाता। अगर कोई बच्चा रोता है तो कहा जाता है, “चुप रहो, मजबूत बनो।” अगर बच्चा कुछ मांगता है, तो ताना मिलता है कि “इतनी ज्यादा इच्छाएं मत रखो।” या अगर बच्चे ने अपनी कोई राय व्यक्त की तो उसे ये कहकर चुप करा दिया जाता है कि “बड़ों से बहस मत करो।”

बच्चे बहुत इंटेलिजेंट होते हैं और जल्दी ही अपने माहौल के अनुसार एडॉप्ट करना सीख लेते हैं। ऐसे माहौल में बड़ा हो रहा बच्चा भी यह सीख लेता है कि उसके लिए अपनी फीलिंग्स को, अपनी जरूरतों को जाहिर करने की जगह नहीं है। उसे समझा नहीं जाएगा, बल्कि डांट ही पड़ेगी। ऐसे में वो अपनी भावनाएं, इच्छाएं और तकलीफें अंदर ही दबाना शुरू कर देता है।

हालांकि जो बचपन का कोपिंग मैकेनिज्म था, वो एडल्ट लाइफ में एक इंटर्नल वायरिंग और बिहेवियर पैटर्न में तब्दील हो जाता है और यह पैटर्न बड़े होने पर फिजिकल और मेंटल हेल्थ को नुकसान पहुंचाने लगता है।

बचपन में भावनाएं दबाने का असर

जो भी बच्चे छुटपन में अपनी भावनाओं और जरूरतों को जाहिर नहीं कर पाते, बड़े होने के बाद उनकी पर्सनैलिटी में कुछ इस तरह के प्रभाव दिखाई दे सकते हैं। नीचे ग्राफिक देखें, फिर हम उसके बारे में डिटेल में बात करेंगे।

आत्म-सम्मान कमजोर होना: जब बच्चे को लगता है कि उसकी भावनाएं या जरूरतें महत्वपूर्ण नहीं हैं तो वह खुद को हाई इस्टीम में नहीं देखता। अपनी रिस्पेक्ट नहीं होता और उसके दूसरों से कंट्रोल या डॉमिनेट होने के चांस बढ़ जाते हैं।

डर और झिझक: अपनी जरूरतें व्यक्त न कर पाने वाले बच्चे बड़े होकर भी किसी भी रिश्ते में अपनी बात कहने से झिझकते हैं। उन्हें यह डर होता है कि सामने वाला नाराज हो जाएगा या उनसे दूर हो जाएगा। बहुत बुनियादी और बेसिक बातें भी उन्हें ऐसी लग सकती हैं कि वो बहुत नीडी साउंड कर रहे हैं। वो हमेशा दूसरों के मुताबिक ही खुद को एडजेस्ट करते रहते हैं।

भीतर आक्रोश जमा होना: चुपचाप सहने की आदत बाद में गुस्से या चिड़चिड़ेपन के रूप में निकल सकती है। जब हम लंबे समय तक अपनी भावनाओं को दबाते हैं तो वह अंदर-ही-अंदर जमा होती रहती हैं और फिर अनहेल्दी तरीकों से एक्सप्रेस होती हैं।

रिश्तों में असमानता: वयस्क होने पर ऐसे लोग दूसरों को खुश करने में लगे रहते हैं और खुद को नजरअंदाज करते हैं। वे अकसर एक बराबरी का रिश्ता नहीं बना पाते, जहां दोनों पार्टनर्स की जरूरतों और इच्छाओं का सम्मान हो।

मेंटल हेल्थ पर असर: लगातार दबे हुए तनाव और असंतोष से डिप्रेशन, एंग्जाइटी और यहां तक कि शारीरिक बीमारियां भी हो सकती हैं, जैसे नींद की गड़बड़ी, सिरदर्द, ब्लड प्रेशर आदि।

NICE (नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर एक्सेलेंस, यूके), HSE (हेल्थ, सेफ्टी एंड एनवायर्नमेंट) और RCPsych (रॉयल कॉलेज ऑफ साइकेट्रिस्ट्स, यूके) की रिपोर्ट्स में बार-बार ये फैक्ट सामने आया है कि बचपन के अनुभव ही वयस्क जीवन में हमारी मेंटल हेल्थ की नींव रखते हैं।

आगे बढ़ने से पहले मैं आपको अपने इमोशनल स्टेट को बेहतर समझने के लिए एक सेल्फ स्क्रीनिंग टूल दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक में 5 सवाल दिए हैं। आपको इन सवालों का हां या ना में जवाब देना है। अगर तीन से ज्यादा सवालों का आपका जवाब हां में है तो आपको अपनी एसर्टिवनेस को मजबूत करने, खुद को ज्यादा मजबूती के साथ अभिव्यक्त करने की जरूरत है।

4 सप्ताह का सेल्फ हेल्प प्रोग्राम (CBT आधारित)

यहां मैं आपको CBT (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) आधारित चार हफ्ते का एक सेल्फ हेल्प प्लान दे रहा हूं। आपको रोज इन चीजों का अभ्यास करना है। अपनी भावनाओं, जरूरतों को व्यक्त करने के साथ-साथ NO बोलने का भी अभ्यास करना है।

सप्ताह 1

पहचान

  • अपनी भावनाओं और जरूरतों को ऑब्जर्व करें।
  • ध्यान दें कि किसी स्थिति में आप कैसा महसूस कर रहे हैं।
  • जैसे दुख, गुस्सा, तकलीफ, अकेलापन, खुशी, उदासी वगैरह।
  • फिर ऑब्जर्व करें कि क्या आपने अपनी ये भावनाएं व्यक्त कीं।
  • हर दिन अपनी डायरी में ये बातें नोट करें।
  • जैसे कहां-कहां आप अपनी फीलिंग को एक्सप्रेस नहीं कर पाए।
  • जैसे उस वक्त मुझे गुस्सा आया, लेकिन मैंने दबा दिया।
  • फीलिंग्स के साथ कहां-कहां आपने अपनी जरूरतें एक्सप्रेस नहीं की।
  • उन जरूरतों को भी डायरी में नोट करें।
  • जैसे रेस्त्रां में आपको कुछ और खाने का मन था, लेकिन आपने नहीं कहा।
  • जैसे आप कोई और मूवी देखना चाहते थे, लेकिन आप चुप रहे।
  • जैसे आपका पार्टी में जाने का मन नहीं था, लेकिन आपने कहा नहीं।
  • हर दिन 5 मिनट अपनी डायरी में दिन भर की ये सारी बातें लिखें।

सप्ताह 2

छोटे कदमों से शुरुआत

  • अपनी इच्छाओं, भावनाओं, जरूरतों को व्यक्त करें।
  • छोटी-छोटी बातों से शुरुआत करें।
  • सबसे करीबी रिश्तों में ये शुरुआत करें, जैसे कोई दोस्त।
  • कोई एक छोटी सी इच्छा व्यक्त करें।
  • जैसे मूवी या किसी डिश के सेलेक्शन में।
  • रोज NO कहने का अभ्यास करें।
  • इसकी शुरुआत भी छोटी-छोटी चीजों से करें।
  • जब कोई काम करने का मन न हो तो विनम्रता से NO कहें।
  • न करने का बहाना न बनाएं। साफ कहें कि मेरा मन नहीं है।
  • ना कहते हुए अपनी फीलिंग्स को ऑब्जर्व करें।
  • अगर असहजता, डर महसूस हो रहा है तो उसे नोट करें।
  • शुरू में ऐसा महसूस होना स्वाभाविक है।
  • लेकिन धीरे-धीरे ना कहना अपने आप सहज होता जाएगा।

सप्ताह 3

भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना

  • अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करने का अभ्यास करें।
  • अपने वाक्यों की शुरुआत “मैं” से करें। जैसे
  • “मैं ऐसा करना चाहता हूं।”
  • “मैं यह महसूस करता हूं।”
  • “मुझे ऐसा लगता है।”
  • “मेरा ऐसा विचार है।”
  • “मेरा ये करने का मन है।”
  • “मुझे ऐसा अच्छा लगता है।”
  • “मैं ऐसा सोचता हूं।”

उदाहरण–

  • “मुझे अच्छा लगेगा अगर हम साथ में समय बिताएं।”
  • “मुझे हॉरर फिल्में देखना पसंद नहीं है। मुझे फैमिली ड्रामा ज्यादा पसंद है।”
  • “मुझे शोरगुल वाली पार्टी में मजा नहीं आता। मुझे घर में रहना ज्यादा अच्छा लगता है।”
  • अपने वाक्यों में “मैं” के साथ खुद की इच्छाओं, जरूरतों और भावनाओं को सकारात्मक ढंग से कहने की प्रैक्टिस करें। यह तरीका आलोचना जैसा नहीं लगता और बातचीत को सहज बनाता है।

सप्ताह 4

रिश्तों में संवाद

  • ऊपर दिए गए अभ्यास के साथ रिलेशनशिप में भी इस बारे में खुलकर बात करें।
  • बातचीत के लिए एक शांत समय चुनें, जब कोई झगड़ा या तनाव न हो।
  • बातचीत की शुरुआत अपनी भावनाओं से करें, न कि सामने वाले की गलती से।
  • उदाहरण: “जब मेरी बातें अनसुनी रह जाती हैं, तो मुझे दुख होता है।”
  • बातचीत को समस्या सुलझाने के अवसर की तरह देखें, न कि लड़ाई की तरह।

परिवार से इस विषय पर कैसे बात करें?

शांति से: आवाज ऊंची न करें, बात करने के लिए शांत समय और माहौल चुनें।

सम्मान के साथ: यह न कहें कि “तुमने गलत किया।” ये कहें कि “मुझे अच्छा लगेगा अगर…।”

सीमाएं तय करें: अगर लगातार आलोचना हो रही है तो साफ कहें, “इस तरह की बातें मुझे तकलीफ देती हैं, आप ऐसा न करें। प्लीज स्टॉप।”

धैर्य रखें: परिवार का रवैया रातों-रात नहीं बदलेगा, लेकिन धीरे-धीरे बदलाव आ सकता है।

प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी

अगर लगातार दबे हुए गुस्से, उदासी या तनाव के कारण नींद, भूख, काम या रिश्तों पर गंभीर असर पड़ रहा है, तो केवल सेल्फ हेल्प पर्याप्त नहीं है। ऐसे में किसी मनोचिकित्सक या काउंसलर से सीधे मदद लेना जरूरी है।

निष्कर्ष

आप एक वयस्क हैं और अब अपनी जिंदगी की एजेंसी अपने हाथों में लेकर इसे बदलने की शुरुआत कर सकते हैं। ध्यान रहे कि बदलाव आपके ही हाथ में है। इसके लिए आपको खुद शुरुआत और कोशिश करनी होगी।

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