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सोटी मार होली सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि लोगों की आस्था और परंपरा से जुड़ा आयोजन है. इसमें पूरे गांव की भागीदारी होती है. महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग सभी इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं. आज भी निमाड़ के कई गांवों में यह परंपरा उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है. यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का काम कर रही है.
रंगों का त्योहार होली पूरे देश में अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र, खासकर खंडवा जिले में मनाई जाने वाली ‘सोटी मार होली’ अपनी अनोखी परंपरा के कारण पूरे इलाके में खास पहचान रखती है. यहां होली सिर्फ रंग और गुलाल से नहीं, बल्कि साहस, परंपरा और रोमांच के साथ खेली जाती है. इस परंपरा में महिलाओं के हाथों में गुलाल नहीं, बल्कि निर्गुण के पेड़ की सोटी (डंडी) होती है और युवक उस मार को सहते हुए जीत हासिल करने की कोशिश करते हैं.
निमाड़ की सांस्कृतिक विरासत में शामिल यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है. स्थानीय लोगों के अनुसार यह सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामूहिक उत्सव का प्रतीक है. होली के मौके पर गांव में विशेष आयोजन किया जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं.
अनुष्ठान और पूजा से होती है शुरुआत
सोटी मार होली की शुरुआत विधि-विधान से होती है. होली दहन स्थल पर करीब 12 से 15 फीट ऊंचा एक मजबूत खंभा गाड़ा जाता है, जिसे मलखंभ की तरह तैयार किया जाता है. इस खंभे के शीर्ष पर ध्वजा लगाकर पूजा की जाती है. इसके बाद खंभे के ऊपरी हिस्से में गुड़ बांधा जाता है, जो इस परंपरा का मुख्य केंद्र होता है. पूजा के बाद शुरू होता है असली रोमांच. गांव के युवक इस खंभे पर चढ़कर ऊपर बंधे गुड़ को तोड़ने का प्रयास करते हैं. लेकिन यह काम बिल्कुल आसान नहीं होता.
महिलाएं करती हैं सोटी से वार
जैसे ही युवक खंभे पर चढ़ने की कोशिश करते हैं, वैसे ही गांव की महिलाएं निर्गुण की सोटी लेकर उन्हें रोकने का प्रयास करती हैं. महिलाएं पूरी ताकत से सोटी से वार करती हैं, ताकि युवक ऊपर तक न पहुंच सकें. युवक इन वारों को सहते हुए खंभे पर चढ़ते हैं. यह दृश्य बेहद रोमांचक होता है. एक तरफ महिलाएं परंपरा निभाते हुए सोटी चलाती हैं, तो दूसरी तरफ युवक साहस और धैर्य का परिचय देते हुए ऊपर पहुंचने की कोशिश करते हैं.
गुड़ तोड़ना होता है जीत का प्रतीक
यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कोई युवक खंभे के शीर्ष तक पहुंचकर गुड़ को तोड़ नहीं देता. जैसे ही गुड़ टूटता है, वैसे ही खेल समाप्त हो जाता है और उस युवक को विजेता माना जाता है. इसे सम्मान और जीत का प्रतीक माना जाता है. स्थानीय समाजसेवी लव जोशी बताते हैं कि जिस तरह उत्तरप्रदेश के ब्रज क्षेत्र की लठमार होली प्रसिद्ध है. उसी तरह निमाड़ की सोटी मार होली भी अपनी अलग पहचान रखती है. यह परंपरा निमाड़ की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक है.
सोटी मार होली सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि लोगों की आस्था और परंपरा से जुड़ा आयोजन है. इसमें पूरे गांव की भागीदारी होती है. महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग सभी इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं. आज भी निमाड़ के कई गांवों में यह परंपरा उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है. यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का काम कर रही है और निमाड़ की पहचान को जीवित रखे हुए है.
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