उज्जैन में मंदिरों में शराब का भोग, भक्तों में बंटता है मदिरा का प्रसाद; जानें

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उज्जैन में एक धार्मिक परंपरा आज भी निभाई जा रही है, जहां मान्यता के अनुसार, माता महामाया और देवी महाकाल मंदिरों में मदिरा का भोग लगाने से शहर को महामारी और आपदाओं से सुरक्षा मिलती है. इसके अलावा नगर पूजा भी की जाती है. बताया जाता है कि करीब 40 मंदिरों में मदिरा का भोग लगाया जाता है.

धार्मिक नगरी उज्जैन में एक अनोखी और प्राचीन परंपरा आज भी पूरी आस्था के साथ निभाई जा रही है, जिसकी शुरुआत राजा विक्रमादित्य के समय से मानी जाती है. मान्यता के अनुसार, माता महामाया और देवी महाकाल मंदिरों में मदिरा का भोग लगाने से शहर को महामारी और आपदाओं से सुरक्षा मिलती है. महाअष्टमी के पावन अवसर पर इस विशेष परंपरा का आयोजन किया जाता है, जिसमें पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. इस दौरान शहर के लगभग 40 मंदिरों में माता को मदिरा अर्पित की जाती है, जो इस परंपरा की विशेष पहचान है. इस वर्ष भी महाअष्टमी पर श्रद्धा और विश्वास के साथ माता महामाया और देवी महाकाल की पूजा कर मदिरा का भोग लगाया गया. सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी लोगों की गहरी आस्था और विश्वास को दर्शाती है, जिसे हर साल पूरे नियम और श्रद्धा के साथ निभाया जाता है.

शराब का प्रसाद और नगर पूजा का महत्व
इस भव्य आयोजन में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत अरविंद पुरी महाराज विशेष रूप से शामिल हुए और पूजन खत्म होने के बाद माता मंदिर में शराब का भोग लगाया गया. बता दें कि अंत मे चढ़ाई गई शराब को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बांट दिया जाता है. बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रसाद लेने आते हैं. उज्जैन नगर में प्रवेश का प्राचीन द्वार है. नगर रक्षा के लिए यहां चौबीस खंभे लगे हुए थे, इसलिए इसे चौबीस खंबा द्वार कहते हैं. यहां महाअष्टमी पर सरकारी तौर पर पूजा होती है और फिर उसके बाद पैदल चलकर नगर पूजा इसलिए की जाती है ताकि देवी मां नगर की रक्षा कर सकें और नगर को महामारी से बचाएं.

नगर पूजा में लगता है 12 से 14 घंटे का समय
इस यात्रा में 27 किलोमीटर लंबे मार्ग में कोटवार एक हांडी में मदिरा की धारा लेकर चलते हैं. रास्ते में आने वाले प्रमुख देवी और भैरव मंदिरों में नए ध्वज और चोला चढ़ाया जाता है. वहीं कुछ देवी मंदिरों में माता रानी को पूजन सामग्री के साथ मदिरा का भोग लगाने की भी परंपरा है. पूरी यात्रा में बैंड-बाजों के साथ भक्तगण माता के जयकारे लगाते हुए चलते हैं. नगर पूजा में 12 से 14 घंटे का समय लगता है. रात करीब 9 बजे गढ़कालिका क्षेत्र स्थित हांडी फोड़ भैरव मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ नगर पूजा संपन्न होती है.

पूजन के लिए ग्वालियर स्टेट से आते हैं रुपए
मंदिर के पुजारी के अनुसार, आज भी ग्वालियर के महाराज के यहां से सवा सौ रुपए की राशि तहसील कार्यालय में आती है. बाकी का पैसा उज्जैन कलेक्टर देते हैं और उसके बाद ही पूजन का क्रम, सभी व्यवस्थाएं जुटाकर शुरू किया जाता है. जब देवियों और भैरव को मदिरा का भोग लगता है, तो उस हांडी का प्रसाद भक्तों में भी बांटा जाता है.

कन्या पूजन और विशाल भंडारे का होगा आयोजन
अखाड़ा परिषद के प्रवक्ता डॉ. गोविंद सोलंकी ने बताया कि यात्रा के पश्चात बड़नगर रोड स्थित श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी में भव्य कन्या पूजन के साथ भक्तों का भंडारा आयोजित किया जाएगा. इसमें सभी अखाड़ों के संत-महंतों के साथ जनप्रतिनिधि और अधिकारी गण शामिल होंगे.

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