सीमित पढ़ाई, लेकिन बड़ा हुनर… कैलाश पांडे ने धागों से रची सफलता की कहानी

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Success Story: उत्तराखंड के नैनीताल जिले के एक छोटे से गांव से आने वाले कैलाश पांडे आज अपनी अनोखी धागों से बनी कला (Thread Art) के कारण पहचान बना रहे हैं. यह कला पूरी तरह से सिलाई के धागों पर निर्भर है और ऐसे ही तैयार की जाती है, जो देखने में बेहद आकर्षक होती है. कैलाश बताते हैं कि पहाड़ों में पहले खिलौनों की कमी होती थी, इसलिए घर की दादी-नानी पुराने कपड़ों से बच्चों के लिए खिलौने बना दिया करती थीं.

वहीं से इस कला की शुरुआत हुई. समय के साथ बाजार में सस्ते चीनी खिलौने आने लगे और यह पारंपरिक कला धीरे-धीरे खत्म होने लगी. लेकिन अब फिर से लोग हैंडमेड चीजों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, जिससे इस कला को नई पहचान मिल रही है.

कैलाश पांडे का बचपन पहाड़ों की कठिन परिस्थितियों में बीता. सीमित संसाधनों के कारण वह ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए और केवल माध्यमिक शिक्षा तक ही पढ़ सके. परिवार की मदद के लिए उन्होंने कई जगह काम किया, यहां तक कि एक लोहे की फैक्ट्री में भी नौकरी की. लेकिन कला के प्रति उनका लगाव उन्हें बार-बार इसी दिशा में खींच लाता था.

पिछले 12-14 सालों में उन्होंने लगातार अपनी कला को निखारा और करीब 20-25 साल की मेहनत के बाद आज उनकी कला पहचान बना रही है. कैलाश पांडे की यह कला अब सिर्फ उनकी नहीं रही, बल्कि पूरे गांव की ताकत बन गई है. उनके साथ गांव की करीब 50-60 महिलाएं जुड़ी हुई हैं जो इस काम को सीखकर अलग-अलग तरह की चीजें बनाती हैं.

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इनमें गार्डन स्टिक, डेकोरेशन आइटम, गिफ्ट आइटम और कई तरह के सजावटी उत्पाद शामिल हैं. किसी-किसी कलाकृति को बनाने में कुछ घंटे लगते हैं, जबकि कुछ बड़े कामों को तैयार करने में 1-2 दिन या कभी-कभी एक हफ्ता भी लग जाता है. पहाड़ों से निकलकर अब यह कला दिल्ली तक पहुंच चुकी है.

दिल्ली के करीगर बाजार (Karigar Bazaar) से जुड़ने के बाद कैलाश पांडे और उनकी टीम को बड़ा मंच मिला है. यहां लोग उन्हें लाइव क्राफ्ट बनाते हुए देखते हैं और वहीं से ऑर्डर भी देते हैं. कैलाश बताते हैं कि पिछले साल अगस्त से इस प्लेटफॉर्म से जुड़ने के बाद उनकी बिक्री में तेजी आई है. अब तक वे करीब 60-70 लाख रुपये तक का सामान बेच चुके हैं, जबकि होलसेल ऑर्डर अलग से मिलते रहते हैं.

कैलाश का कहना है कि सरकार की तरफ से कारीगरों के लिए कई योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन गांव के कलाकारों तक उनका लाभ पहुंचना आसान नहीं होता. कई बार जानकारी की कमी और सिस्टम की वजह से असली कलाकार इन योजनाओं का फायदा नहीं उठा पाते. फिर भी वे मानते हैं कि अगर कलाकार की कला अच्छी हो, तो वह अपने दम पर आगे बढ़ सकता है.

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