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Chhatarpur News: तिजिया बाई ने कहा कि उन्होंने ही हमें स्व-सहायता समूह से जुड़ने के लिए प्रेरित किया और ट्रेनिंग दी. होली का मौका था, तो हमने प्राकृतिक तरीके से तीन तरह के रंग तैयार किए. ये रंग फूल-पत्तियों से बनाए गए.
छतरपुर. आज हम आपको एक ऐसी अम्मा की कहानी बताने जा रहे हैं, जो पढ़ी-लिखी तो नहीं हैं लेकिन फुर्सत के समय में कुछ सीखने की ललक थी. उन्हें किसी ने स्व-सहायता समूह के बारे में जानकारी दी. इसके बाद वह समूह से जुड़ गईं और अब 12 महीने में सीजन के डिमांड के अनुसार तरह-तरह के प्रोडक्ट बनाती हैं. मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के लवकुश नगर के एक छोटे से गांव रानीपुरा की रहने वालीं तिजिया बाई अहिरवार की जिंदगी स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद बदल गई. जहां पहले वह घर और खेत तक सीमित थीं, वहीं अब गांव से बाहर निकलकर शहरों में अपने हाथों से बनाए प्रोडक्ट बेच रही हैं. इससे कमाई तो हो रही है, साथ ही उनका आत्मविश्वास भी बढ़ गया है.
तिजिया बाई ने लोकल 18 से कहा, ‘जब मैं स्व-सहायता समूह से नहीं जुड़ी थी, तो वही घर और खेत के काम करती रहती थी. घर में पशुओं का काम और खेत में चारा काटना और फसलों की तकाई करना जैसे काम में लगी रहती थी. पढ़ाई-लिखाई की नहीं थी, तो यही काम करना था लेकिन मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि मैं भी शहर में जाकर लोगों से बातचीत करके प्रोडक्ट बेचूंगी. ये सब आजीविका मिशन की मदद से हो पाया है. उन्होंने ही हमें स्व-सहायता समूह से जुड़ने के लिए प्रेरित किया और प्रशिक्षण भी दिया. होली त्योहार का मौका था, तो हमने प्राकृतिक तरीके से तीन तरह के रंग तैयार किए, जिसमें हरा, भगवा और पीला रंग शामिल हैं. ये सभी रंग फूल-पत्तियों से बनाए गए.’
रंगों के अलावा और भी प्रोडक्ट
उन्होंने कहा, ‘मैंने अपने हाथों से पलाश के फूल, गेंदे के पत्ते, पालक पत्ते, गेंदा के पीले फूल, आरारोट और हल्दी से ये तीन तरह के कलर तैयार किए. इन रंगों को बनाने में एक महीना लगा. हमनें एक महीने पहले से तैयारी कर दी थी. हालांकि हर साल होली और दशहरा-दीपावली के मौके पर रंग तैयार करते हैं. साथ ही दूसरे प्रोडक्ट भी तैयार करते हैं. चना और मूंग पापड़ भी बनाते हैं. आंवला की विभिन्न तरह की कैंडी भी बनाते हैं. गाय के गोबर के उपले भी बनाते हैं. बरसात सीजन में बरी भी बेचते हैं. दूसरे स्टॉल में ये कुछ प्रोडक्ट रखे हुए हैं.’
नुकसान नहीं करते रंग
तिजिया बाई ने आगे कहा, ‘ये रंग अगर आंख, मुंह और कान में चले जाते हैं, तो भी दिक्कत नहीं है क्योंकि फूल-पत्तियों से बनाए गए हैं. फूल-पत्तियों के साथ ही आरारोट मिलाया जाता है, जो फिंगर फ्राइड खाने वाले आइटम में भी मिलाया जाता है. फिलहाल अब गर्मी का मौसम शुरू हो गया है, तो अब बेल फल की मिठाई बनाएंगे, जो बहुत ज्यादा लोग खाते हैं. हर साल गर्मी के सीजन में ही यह मिठाई बनाते हैं.’
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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