कम बीमारी, कम दाना, ज्यादा दाम, देसी मुर्गी पालन का सफल मॉडल

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Chhapra News : बिहार के सारण (छपरा) जिले के मांझी प्रखंड के कलान गांव निवासी किसान मोहम्मद इशाक अंसारी ने देसी मुर्गी पालन को कम लागत और ज्यादा मुनाफे का सफल मॉडल बना दिया है. पहले फॉर्म वाली उजाला नस्ल पालने वाले इशाक को बीमारी, दाना और दवा पर अधिक खर्च का सामना करना पड़ता था, लेकिन अब वे सोनाली और FFG-2 देसी नस्ल को खुले में बाउंड्री बनाकर पाल रहे हैं. इन नस्लों में बीमारी कम होती है, चारे का खर्च घटता है और तीन महीने में ढाई से तीन किलो तक वजन हो जाता है. अंडा, चूजा और तैयार मुर्गा बेचकर वे कम खर्च में बेहतर कमाई कर रहे हैं, जिससे यह मॉडल आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा बनता जा रहा है. रिपोर्ट- विशाल कुमार

बिहार में छपरा जिले के किसान अब नगदी फसल के साथ-साथ मुर्गा-मुर्गी, बकरी, बत्तख पालन करने का भी खास आइडिया अपना रहे हैं. इस आइडिया से मुर्गा, बकरी, बत्तख पालन करने पर खर्च कम आ रहा है. जबकि कमाई तगड़ी हो रही है. आज हम एक मांझी प्रखंड के एक ऐसे किसान के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका मुर्गा-मुर्गी पालन करने का आइडिया बेहद ही खास है. इस आईडिया से कम खर्चे में किसान डबल कमाई कर रहे हैं.

आज हम बात कर रहे हैं मांझी प्रखंड के कलान गांव निवासी किसान मोहम्मद इशाक अंसारी की, जिन्हें मुर्गा- मुर्गी पालन करने का 7 साल से अधिक पुराना अनुभव है. फिलहाल वह देसी मुर्गी का पालन कर रहे हैं. इसके पहले वह उजला वाले फॉर्म की मुर्गी पालन कर रहे थे. इस नस्ल के मुर्गी के पालन करने में काफी ज्यादा खर्च आता था और कमाई कम होती थी. यही नहीं, उजला मुर्गी पालन करने में ज्यादा नुकसान भी हुआ करता था. इसके पालन में बहुत ज्यादा बीमारी होने की भी संभावना रहती थी. जिससे कभी-कभी मुर्गा पालकों का बहुत बड़ा नुकसान हो जाता था. फिलहाल उनके द्वारा इस समय देसी मुर्गा-मुर्गी में सोनाली और FFG-2 नस्ल की मुर्गी और मुर्गा पालन किया जा रहा है.

देसी मुर्गी पालन करने से किसानों को सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि जल्दी देसी मुर्गी बीमार नहीं पड़ती हैं. जिससे किसानों का नुकसान होने की संभावना कम रहती है. जबकि फार्म के उजाला नस्ल की मुर्गी पालन करने में किसानों का नुकसान होने की संभावना बनी रहती है.

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इस नस्ल की मुर्गी काफी ज्यादा बीमार होती हैं. जिसकी वजह से दवा खाने की व्यवस्था और फॉर्म रखरखाव की व्यवस्था में ज्यादा खर्च आता है. जबकि देसी मुर्गी को खुला में पालन करने से चारा खुद से मुर्गी खा लेती है. कुछ ही परसेंट दान देना पड़ता है. ये नस्ल महंगी भी मार्केट में बिकती हैं. साथ ही बीमार भी कम होती है. जिसकी वजह से किसानों को देसी मुर्गी पालन करने में खर्च कम आता है और कमाई ज्यादा होता है.

सारण के किसान सोनाली और FFG-2 नस्ल देसी मुर्गी का पालन कर रहे हैं. सोनाली का वजन कम होता है. बीमारी कम होते हैं. इस नस्ल में एक और खासियत है कि अंडा ज्यादा देती हैं और यह मुर्गी बच्चा भी तैयार करती हैं. सोनाली मुर्गी का अंडा भी महंगे दर पर सेल हो जाता है. FFG-2 नस्ल की मुर्गी का वजन ज्यादा होता है. लगभग 3 महीने में 3 किलो से ज्यादा हो जाता है. इस मुर्गी का अंडा भी बड़ा होता है. खाने में भी स्वाद अच्छा लगता है. यह दोनों नस्ल किसान खुले में भी पालकर कम खर्चे में अच्छी कमाई कर सकते हैं.

किसान मोहम्मद इशाक अंसारी ने लोकल 18 से बताया कि उन्हें 7 साल पुराना मुर्गी पालन करने का अनुभव है. वह सोनाली और FFG-2 देसी नस्ल की मुर्गी का पालन कर रहे हैं. इसके पहले उजाला वाला फॉर्म की मुर्गा मुर्गी पालन कर रहे थे. जो बीमार ज्यादा होती थी. दाना, दवा और रख रखाव पर ज्यादा खर्च भी हुआ करता था. बीमारी से ज्यादा नुकसान भी ज्यादा होता था, लेकिन जो फिलहाल देसी नस्ल मुर्गी मुर्गा पालन कर रहे हैं. यह काफी कम खर्चे में खेत में हो रही है.

वह मुर्गियों के लिए बाउंड्री करके एक छोटा सा फॉर्म बना दिए हैं, जिसमें काफी कम चारा देना पड़ता है. खुद से चारा बाउंड्री में खाकर तैयार हो जाती हैं. खेत में पालने की वजह से कीड़ा मकोड़ा बाउंड्री में आता रहता है, इसके अलावा फसल का गिरा हुआ अनाज भी मिल जाता है. जिसको मुर्गी खाकर तैयार हो जाती है. यह बीमार भी काफी कम होती है. इस नस्ल को पालने में खर्च कम आता है. साथ ही कमाई ज्यादा होती है. इसको पालकर अंडा, बच्चा और मुर्गा बेचकर अच्छी कमाई कर लेते हैं. जहां 3 महीने में ढाई से 3 किलो का मुर्गा हो जाता है. फार्म के मुर्गा से कहीं ज्यादा महंगा इसको बेचकर वह कमाई कर लेते हैं. वह पिछले 1 साल से इस नस्ल को पाल रहे हैं. जहां कम खर्च में ज्यादा कमाई भी हो जाती है.

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