Balaghat News: बीते कुछ सालों से बालाघाट में वन्य प्राणियों और मानव की बीच संघर्ष के मामले तेजी से बढ़े हैं. कभी वनों की ओर चरने के लिए जाने वाले पालतू पशु वन्य प्राणियों का चारा बनते थे, तो कभी मानव भी उनकी जद में आते थे. लेकिन, अब मामला एक कदम आगे बढ़ गया है. दरअसल, अब तेंदुए की आमद गांव तक हो गई है.
मामला वारासिवनी वन परिक्षेत्र के तहत आने वाले नांदगांव का है, जहां पर लोग अब तेंदुए के हमले के खौफ से रात को ठीक से सो भी नहीं पाते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि आधी-रात तेंदुआ आता है और उनकी बकरियों को निशाना बनाता है. ऐसे में लोकल 18 उस गांव में पहुंचा और जाना कि उस गांव के हालात क्या हैं?
गांव में दहशत, ग्रामीण परेशान
वारासिवनी वन परिक्षेत्र के सिरपुर सर्किल के तहत आने वाला गांव नांदगांव में वैसे तेंदुए से अक्सर सामना होता था. लेकिन, बीते एक महीने से रोज गांव में आ रहा है. ऐसे में अब तक वह तीन बार पालतू मवेशियों का शिकार कर चुका है. इसमें भाईलाल करकाड़े, महेश कटरे की दो बकरियां और महेंद्र बिसेन की एक बकरी शामिल है. रोज-रोज हो रही घटनाओं से ग्रामीण घबराए हुए हैं. गांव में लगभग हर घर में बकरी पाली जाती है और यहीं उनका मुख्य व्यवसाय है. ऐसे में लगातार हो रहे मामले से उनके व्यवसाय पर प्रभाव पड़ रहा है.
मुआवजा मिल रहा, लेकिन इतना पर्याप्त नहीं
तेंदुआ बकरियों का शिकार कर रहा है और वन विभाग उसका पंचनामा तैयार करता है. लगभग समय पर ही उस मृत पशु की कीमत की भुगतान भी करता है. लेकिन, जितना मुआवजा पशु मालिक को मिलता है, वह पशु की बाजार में कीमत से काफी कम होता है. ग्रामीणों ने बताया कि बकरी किसी भी नस्ल की हो और व्यस्क ही क्यों न हो उस पर सिर्फ तीन हजार रुपए का ही भुगतान होता है. वहीं, गाय के लिए सिर्फ 6000 रुपए है. बैल के लिए आठ हजार रुपए मिलता है. ग्रामीण चाहते हैं कि अगर वन्य प्राणी गांव के भीतर आकर शिकार कर रहा है, तो मुआवजे की कीमत बाजार मूल्य के आधार पर आंकी जाए और उतना ही मुआवजा मिले. महेश कटरे बताते हैं कि वह तेंदुए के शिकार से उनकी दो बकरियों की मौत हुई. दोनों उच्च नस्ल की थी और दोनों की कीमत करीब 24 हजार रुपए थी. लेकिन उन्हें सिर्फ 6 हजार मिले.
अब अपना रहे अलग-अलग उपाय
तेंदुए का खौफ इतना है कि लोग अलग-अलग उपाय अपना रहे हैं. ऐसे में किसी ने अपनी बकरियों के लिए एक बाड़े बंदी की है, तो कई अपनी खटिया पर ही बकरी बांध रहे हैं. वहीं, ग्रामीण बकरी की कोठी के पास खटिया लगा कर भी सो रहे हैं. साथ में वह तेंदुआ से अपनी बकरी को बचाने के लिए पारंपरिक औजार लेकर सोने लगे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि अगर ऐसे उपाय नहीं करेंगे, तो हमारा भारी नुकसान हो जाएगा. वैसे भी वन विभाग से मिलने वाले मुआवजे की राशि पर्याप्त नहीं है. बकरी पालन से ही उनका जीवन चलता है और शादी ब्याह जैसे खर्चों में काफी मदद मिलती है.
कई गांवों में तेंदुए की आमद
ग्रामीणों ने लोकल 18 को बताया कि बीते एक महीने से तेंदुए की आमद काफी बढ़ गई है. ऐसे में नांदगांव पंचायत के तहत आने वाले पांच टोले जिसमें बिसटोला, धोबीटोला, नगझर, मरारी टोला और बस्ती शामिल है. वहीं, दूसरी तरफ रमरमा, बोटेझरी, सिर्रा और सिरपुर में भी तेंदुए की मूवमेंट देखी गई है. लेकिन, सबसे ज्यादा नुकसान नांदगांव को हुआ है. ग्रामीणों ने बताया कि शाम के पांच बजे के बाद खेत और जंगल की ओर जाने के लिए मना किया गया. वहीं खेत भी सुबह आठ बजे जाने के लिए कहा गया है.
रात दो बजे आता और बकरी ले जाता
ग्रामीणों ने बताया कि तेंदुआ रात में करीब दो बजे आता है और बकरी की शिकार कर के चले जाता है. ऐसे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि जिस इलाके में तेंदुए की मूवमेंट है. वह सोनेवानी के जंगलों से लगा हुआ है. वहीं, तेंदुए को समझ आ गया है कि गांव में आसान से शिकार मिल रहा है और रात का सूनापन तेंदुए के लिए अनुकूल है. नतीजतन तेंदुआ गांव में लगातार आ रहा है.
वन विभाग की गश्ती बढ़ी
इधर बीट गार्ड लोकेश टेंभरे ने लोकल 18 को बताया कि एक महीने में 6 बकरियों का शिकार किया है. ऐसे में मुनादी करवाकर लोगों को सावधान रहने की सलाह दी जा रही है. वहीं, विशेष टीम बनाकर गांवों में गश्त की जा रही है. वहीं, पटाखे फोड़कर तेंदुए को जंगल की ओर भगाया जा रहा है. इसके अलावा मृत पशुओं का पंचनामा बनाकर समय पर मुआवजा दिया जाता है.
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