कभी खाने तक के थे लाले, नहीं मानी हार, 72 साल की उम्र में खड़ा कर दिया बिजनेस

मुजफ्फरपुर. अक्सर समाज में किसान का मतलब पुरुष से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन मुजफ्फरपुर की एक महिला किसान ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है. हम बात कर रहे हैं मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड अंतर्गत आनंदपुर गांव की रहने वाली राजकुमारी देवी उर्फ किसान चाची की, जिन्होंने अपने संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर न केवल बिहार बल्कि देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है.

राजकुमारी देवी आज खेती और अपने हाथों से बनाए गए पारंपरिक अचार के लिए पूरे देश में जानी जाती हैं. साल 2019 में देश के प्रथम नागरिक, राष्ट्रपति द्वारा उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया, जो उनके जीवन संघर्ष और उपलब्धियों का सबसे बड़ा प्रमाण है. किसान चाची बताती हैं कि उनके यहां तैयार होने वाला अचार बिहार के सभी सरकारी मॉल के साथ-साथ आसपास के थोक और खुदरा बाजारों तक पहुंचता है. मांग इतनी अधिक है कि वे अभी सभी ऑर्डर पूरे नहीं कर पा रही हैं. आने वाले छह महीनों में उनके अचार का व्यवसाय दूसरे राज्यों तक पहुंचाने की तैयारी चल रही है.

ब्रांड और गुणवत्ता की बनी पहचान
फिलहाल किसान चाची के यहां 25 से 30 महिलाएं नियमित रूप से काम करती हैं, जबकि आम के सीजन में यह संख्या 50 से 60 तक पहुंच जाती है. उन्होंने जब अचार बेचने की शुरुआत की थी, तब 50 ग्राम अचार की कीमत मात्र 5 रुपये थी. आज वहीं अचार 500 ग्राम में 150 से 200 रुपये तक बिक रहा है, जो उनके ब्रांड और गुणवत्ता की पहचान बन चुका है.

किसान चाची का जन्म वर्ष 1953 में मुजफ्फरपुर जिले के बरूराज थाना क्षेत्र के मानिकपुर गांव में हुआ. उनके पिता रामचंद्र प्रसाद सिंह एक सरकारी शिक्षक थे, जबकि माता अहिल्या देवी गृहिणी थीं. उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के बरूराज उच्च विद्यालय से प्राप्त की और 10वीं तक पढ़ाई की. साल 1974 में उनका विवाह सरैया प्रखंड के आनंदपुर गांव निवासी अवधेश कुमार चौधरी से हुआ.

हालांकि उनका जीवन आसान नहीं रहा. 1990 में ससुराल में पारिवारिक विवाद के बाद उन्हें पति के साथ अलग कर दिया गया. शादी के 10 साल बाद तक उनका कोई संतान नहीं हुआ था जिस बात को लेकर लोग तरह तरह की बात भी कहते थे और ताने भी मारते थे. परिवार में हालात इतने कठिन हो गए कि घर में खाने तक की समस्या खड़ी हो गई. ऐसे समय में उन्होंने खेतों में काम करना शुरू किया. समाज के ताने, लोगों की टिप्पणियां और परिवार की बातों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. 1996 में बस का किराया देने के पैसे नहीं होने पर उन्होंने साइकिल चलाना सीखा और उसी साइकिल से खेतों में उपजी फसल को बाजार तक पहुंचाने लगीं.

पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव कर चुके हैं सम्मानित
साल 2002 से उन्होंने अचार बनाकर बेचना शुरू किया. 2003 में उन्हें पहली बार पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के हाथों सम्मान मिला. इसके बाद 2007 में मुख्यमंत्री द्वारा आयोजित समारोह में उन्हें किसान श्री सम्मान से नवाजा गया. उस समय वे बिहार की पहली महिला किसान थीं जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ.

25 जनवरी 2019 को जब राष्ट्रपति भवन से उन्हें पद्मश्री के लिए चयन की सूचना मिली, तो उन्होंने सादगी से कहा “ठीक है, अच्छा है.” उन्हें तब यह भी नहीं पता था कि पद्मश्री कितना बड़ा सम्मान है. अंततः 13 मार्च 2019 को राष्ट्रपति द्वारा उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

किसान चाची कहती है कि इस सम्मान मिलने के बाद जीवन पूरा बदल गया पहले कोई नहीं जानता था लेकिन आज इस सम्मान और मेहनत के बदौलत पूरा देश दुनिया जानती है. हमारे अचार के धंधे को भी पंख आ गए हैं. आज हमारा अचार बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश के कोने-कोने में मिलता है.

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