नींद में कमी और तनाव भी हो सकती है ब्रेस्ट कैंसर की वजह, ICMR ने दी चेतावनी, वैज्ञानिकों ने इलाज के लिए बनाया नैनो टेक्नोलॉजी आधारित दवा

महिलाओं में होने वाले कैंसर में ब्रेस्ट कैंसर बेहद कॉमन कैंसर है. इसमें ब्रेस्ट की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं. इससे ब्रेस्ट में ट्यूमर बन जाता है. यदि इसका इलाज शुरुआती स्टेज में न किया जाए तो यह जानलेवा साबित हो सकता है. ब्रेस्ट कैंसर होने पर कई लक्षण नजर आते हैं. इसके कई रिस्क फैक्टर होते हैं, जिससे महिलाओं में ये कैंसर तेजी से फैल रहा है. हाल ही में आईसीएमआर (ICMR) द्वारा की गई एक स्टडी में कहा गया है कि नींद में कमी, स्ट्रेस, मोटापा ब्रेस्ट कैंसर होने के मुख्य कारण हैं.

ICMR की स्टडी क्या कहती है?

टीओआई में छपी एक खबर के अनुसार, आईसीएमआर–नेशनल सेंटर फॉर डिज़ीज इंफॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च द्वारा किए गए एक बड़े अध्ययन में कहा गया है कि भारत में लगातार बढ़ते ब्रेस्ट कैंसर के मामलों की मुख्य वजह है प्रॉपर नींद न लेना. लगातार बढ़ता स्ट्रेस, खासकर पेट के आसपास के भागों में मोटापा. इस स्टडी में ये भी कहा गया है कि देश में प्रत्येक साल 5.6 प्रतिशत की दर से स्तन कैंसर के मामलों में वृद्धि होगी, जिसके परिणाम स्वरूप में हर साल लगभग 50 हजार स्तन कैंसर के नए मामले सामने आ सकते हैं.

इस स्टडी में 22 दिसंबर 2024 तक प्रकाशित हुए भारतीय अध्ययनों का विस्तृत रूप से विश्लेषण किया गया, ताकि ब्रेस्ट कैंसर होने के मुख्य जोखिम कारकों की पहचान की जा सके. 1,900 वैज्ञानिक शोध पत्रों को परखने के बाद 31 अध्ययनों को शामिल किया गया. अलग-अलग स्टडी में लाइफस्टाइल से जुड़े ब्रेस्ट कैंसर को बढ़ाने वाले कई रिस्क फैक्टर सामने आए, जिसमें खराब स्लीप पैटर्न, कमरे में लाइट जला कर सोना, हाई स्ट्रेस लेवल शामिल थे. हालांकि, स्टडी में ये भी कहा गया कि शारीरिक रूप से लगातार एक्टिव रहने से ब्रेस्ट कैंसर होने का जोखिम काफी हद तक कम हो सकता है.

वहीं, इस अध्ययन में पेट के आसपास का मोटापा, जिसे सेंट्रल ओबेसिटी कहते हैं को मुख्य रिस्क फैक्टर के तौर पर पहचाना गया.इसमें जिन महिलाओं का कमर-से-कूल्हे का अनुपात 0.85 या उससे अधिक था, उनमें स्तन कैंसर का जोखिम काफी अधिक पाया गया. शोधकर्ताओं ने कहा कि मेनोपॉज होने के बाद पेट की चर्बी महिलाओं में उनके शरीर के कुल वजन की तुलना में ब्रेस्ट कैंसर होने में मुख्य भूमिका निभाती है. इतना ही नहीं, फैमिली हिस्ट्री भी ब्रेस्ट कैंसर होने के रिस्क फैक्टर में शामिल है.

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कारगर साबित होगी ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में नैनोटेक इंजेक्शन?

हालांकि, अच्छी खबर ये है कि ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में एक नए नैनोटेक ड्रग डिलीवरी टेक्निक को विकसित किया गया है, जो भविष्य में ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में मील का पत्थर साबित हो सकती है. इस ड्रग को आईआईटी मद्रास और ऑस्ट्रेलिया की दो यूनिवर्सिटी मोनाश और डीकिन यूनिवर्सिटी ने मिलकर विकसित किया है. इसमें ब्रेस्ट कैंसर की कोशिकाओं के अंदर डायरेक्ट एक सूक्ष्म सुई के जरिए दवा को पहुंचाया जाएगा. इस प्रॉसेस में हेल्दी कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं होगा. ये नेनोटेक्नोलॉजी इंजेक्शन डिलीवरी सिस्टम एंटीकैंसर ड्रग डॉक्सोरुबिसिन (doxorubicin) को एक खास प्रोटेक्टिव बबल्स में पैक करता है. उसके बाद चिप मौजूद सुईनुमा सिलिकॉन ट्यूब्स की मदद से उसे कोशिकाओं के भीतर पहुंचाता है. इस तरह से हेल्दी सेल्स सुरक्षित रहती हैं.

IIT मद्रास के एप्लाइड मैकेनिक्स और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. स्वाथी सुधाकर के अनुसार, स्तन कैंसर की कोशिकाओं पर किए गए लैब टेस्ट में पॉजिटिव रिजल्ट देखे गए, जिसमें इस दवा ने कैंसर सेल्स की बढ़त पर रोक लगाई. कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के साथ ही ट्यूमर के लिए नए ब्लड वेसल्स के बनने की प्रक्रिया को भी रोक दिया.

ब्रेस्ट कैंसर का इलाज

ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे कॉमन कैंसर में से एक है, लेकिन इसके लक्षणों (Breast cancer) को प्रथम स्टेज में ही पहचान कर इलाज शुरू कर लिया जाए तो बचने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है. आज ग्रामीण इलाके हों या शहरी क्षेत्र, हर जगह ब्रेस्ट कैंसर ने अपना पैर पसार लिया है. चेन्नई में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर 28%, गर्भाशय ग्रीवा कैंसर 14%, ओवरी कैंसर 6% और कॉर्पस यूटेरी 4% मामले हैं. ब्रेस्ट कैंसर का इलाज (Breast cancer treatment) मुख्य रूप से कीमोथेरेपी और रेडिएशन के जरिए की जाती है, लेकिन इन उपचार विधियों में दवाएं पूरे शरीर में फैल जाती हैं, जिससे नॉन-कैंसरस टिशू को भी नुकसान पहुंचता है, साथ ही कई साइड इफेक्ट्स भी नजर आते हैं. ऐसे में नैनोटेक ड्रग डिलीवरी टेक्निक दवा के उपयोग की तुलना में 23 गुना अधिक प्रभावी साबित हुई. डॉ. सुधाकर का कहना है कि कम मात्रा में भी इसकी क्षमता अधिक देखी गई. शोधकर्ताओं के अनुसार, यह नई तकनीक भरोसेमंद है, जिसे बड़े लेवल पर डेवलप करने के बारे में भविष्य में सोचा जा सकता है.इसे क्लिनिकल ट्रायल्स के लिए भी बेहतर माना जा रहा है.

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