Tips to Prevent Kidney Diseases: डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों की तादाद करोड़ों में पहुंच गई हैं. ये दोनों ही बीमारियां तेजी से फैल रही हैं और हर उम्र के लोग इनकी चपेट में आ रहे हैं. आजकल लाइफस्टाइल और खानपान भी बिगड़ गया है, जिसका बुरा असर सेहत पर पड़ रहा है. कई गलत आदतों ने हमें गंभीर बीमारियों के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिनमें किडनी डिजीज सबसे ज्यादा चिंताजनक है. किडनी की बीमारियां अक्सर साइलेंट किलर की तरह शरीर में चुपके-चुपके पनपती रहती हैं और इनके लक्षण तब स्पष्ट होते हैं, जब समस्या काफी गंभीर हो चुकी होती है. ऐसे में लोगों को अगर हाई बीपी और डायबिटीज की शिकायत हो, तो किडनी की जांच कराते रहना चाहिए, ताकि बीमारियों से बचाव हो सके.
नोएडा एक्सटेंशन के यथार्थ हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. उपेंद्र सिंह ने बताया कि पिछले 2-3 साल में किडनी से जुड़ी ओपीडी में मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब 30 से 45 वर्ष के लोगों में भी किडनी की बीमारियां बढ़ रही हैं. इसका मुख्य कारण सेडेंटरी लाइफस्टाइल, अत्यधिक तनाव, शरीर में पानी की कमी और प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन है. क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) और किडनी स्टोन के मामले सबसे ज्यादा देखे जा रहे हैं. CKD इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि यह बिना किसी शोर के धीरे-धीरे बढ़ती है और शुरुआती चरणों में मरीज को इसका आभास नहीं होता है. कई मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं, जब क्रॉनिक किडनी डिजीज सीवियर हो जाती है.
डॉक्टर उपेंद्र के मुताबिक डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर आज भी किडनी डिजीज के सबसे बड़े रिस्क फैक्टर हैं और नेफ्रोलॉजी ओपीडी में आने वाले अधिकांश मरीजों में इनमें से एक या दोनों समस्याएं होती हैं. पेनकिलर्स का ज्यादा या गलत उपयोग, बिना डॉक्टर की सलाह के जिम सप्लीमेंट या स्टेरॉयड लेना, डिहाइड्रेशन और खराब लाइफस्टाइल भी किडनी को नुकसान पहुंचाने के बड़े कारण बन रहे हैं. देर से पहचान होने के कारण डायलिसिस की जरूरत वाले मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जिससे परिवारों पर आर्थिक और मानसिक दबाव भी बढ़ता है. हालांकि किडनी रोग से काफी हद तक बचाव संभव है.
नई दिल्ली के मॉडल टाउन स्थित यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर एंड एचओडी डॉ. बीएस सोलंकी ने बताया कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर किडनी की खराबी के सबसे बड़े कारण हैं. लगभग 60 से 70% क्रॉनिक किडनी डिजीज के मामलों के लिए यही दो बीमारियां जिम्मेदार होती हैं. जब शरीर में ब्लड शुगर या ब्लड प्रेशर अनकंट्रोल रहता है, तो यह किडनी की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त कर देता है. अधिकांश मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं, जब बीमारी स्टेज 3, 4 या 5 तक पहुंच चुकी होती है, जिससे डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है. अगर वक्त रहते इसका पता लग जाए, तो इलाज आसान होता है और ट्रांसप्लांट की जरूरत नहीं पड़ती है.
डॉ. सोलंकी ने बताया कि किडनी की बीमारी अक्सर बिना लक्षणों के बढ़ती है, इसलिए शरीर के संकेतों को समझना बेहद जरूरी है. अगर किसी व्यक्ति को पैरों या चेहरे पर सूजन महसूस हो, पेशाब में बार-बार बदलाव आए या झाग दिखाई दे, तो यह किडनी में गड़बड़ी का संकेत हो सकता है. इसके अलावा लगातार थकान, भूख में कमी, जी मिचलाना, उल्टी आना या अचानक ब्लड प्रेशर का अनकंट्रोल हो जाना भी किडनी रोग के लक्षण हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है. डायबिटीज और बीपी के मरीजों को नियमित रूप से किडनी फंक्शन टेस्ट, क्रिएटिनिन और यूरिन टेस्ट करवाते रहना चाहिए. बचाव के लिए दिन में कम से कम 2 से 3 लीटर पानी पिएं, नमक का सेवन कम करें, धूम्रपान छोड़ें और वजन को नियंत्रित रखें. संतुलित आहार और नियमित व्यायाम के जरिए किडनी फेलियर जैसी गंभीर स्थिति और डायलिसिस की नौबत को काफी हद तक टाला जा सकता है.