खंडवा हादसा: ये तो निकला मौत का रास्ता, पहले भी हो चुकीं डूबने से 2 मौत

खंडवा. मध्य प्रदेश के खंडवा जिले का एक गांव, जो दशहरे के पावन अवसर पर उत्सव की तैयारियों में जुटा था, कुछ ही पलों में यहां मातम पसर गया. यह हादसा इतना भयावह था कि जिसने भी सुना, उसकी आंखें नम हो गईं. 12 से 25 साल की उम्र के बीच के 11 युवक-युवतियों की मौत ने पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया. यह हादसा खंडवा जिले की राजगढ़ पंचायत के पाडला फाटा फालिया इलाके में हुआ. यहां से करीब पांच किलोमीटर दूर जामली गांव के पास अवैला डैम का बेकवाटर क्षेत्र है. इस इलाके में एक पुलिया स्थित है, जो हर साल 8 महीने पानी में डूबी रहती है. यह पुलिया स्थानीय लोगों के लिए एक वैकल्पिक मार्ग बन चुकी है लेकिन सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद खतरनाक है.

गांव के लोग देवी विसर्जन के लिए पहले दीवाल गांव की ओर जा रहे थे लेकिन बाद में रास्ता बदलकर जामली की ओर निकल गए. जब ट्रैक्टर इस डूबे हुए पुलिया वाले मार्ग पर पहुंचा, तो सामने सड़क दिखने के कारण ड्राइवर को लगा कि रास्ता साफ है. वह ट्रैक्टर को उसी पुलिया पर चढ़ा बैठा लेकिन पुलिया पर एक मोड़ था, जो पानी में डूबा होने के कारण नजर नहीं आया. ड्राइवर सीधा चल पड़ा और ट्रैक्टर पानी में समा गया. ट्रॉली में पीछे लोहे के एंगल लगे थे, जो पलटने पर जाल की तरह बन गए। इससे कई बच्चे और युवा फंस गए और बाहर नहीं निकल सके. वहीं कुछ वयस्क लोग जो तैरना जानते थे, किसी तरह जान बचाकर बाहर निकल आए.

गांव में पसरा मातम
इस हादसे में 11 लोगों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई. सभी मृतक किशोर और युवा थे. दो परिवार ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपनी दो बेटियों को खो दिया. जिन घरों में अभी कुछ ही देर पहले पूजा-पाठ और विसर्जन की तैयारियां चल रही थीं, वहां अब रोने की आवाजें ही सुनाई दे रही हैं. पूरे गांव में मातम पसरा है. हर गली, हर घर से चीखें और सिसकियां सुनाई दे रही हैं. दशहरे का दिन जो विजय और खुशी का प्रतीक होता है, वह अब इस गांव के लिए सालों तक एक काला दिन बनकर रहेगा.

पहले भी हो चुकी है ऐसी घटना
यह पहली बार नहीं है कि जब इस पुलिया ने जानें ली हैं. साल 2015 में इसी क्षेत्र में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला और उसकी पोती की भी इसी मार्ग पर डूबने से मौत हो गई थी. इसके बावजूद इस पुलिया की मरम्मत या उस पर रेलिंग लगाने जैसी कोई ठोस कार्रवाई अब तक नहीं की गई थी.

अब जागा प्रशासन
घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया है. विधायक छाया मोरे ने घटनास्थल का दौरा किया और आश्वासन दिया कि अब इस पुलिया पर रेलिंग लगवाई जाएगी या इसका पुनर्निर्माण कराया जाएगा लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इतनी बड़ी जानहानि के बाद ही प्रशासन को जागना होता है.

स्थायी समाधान की जरूरत
इस हादसे ने स्थानीय शासन और प्रशासन की लापरवाही को उजागर कर दिया है. यदि समय रहते सुरक्षा इंतजाम किए गए होते, तो ये 11 जिंदगियां बच सकती थीं. अब जरूरी है कि इस मार्ग को या तो बंद किया जाए या फिर इसे पूरी तरह सुरक्षित बनाया जाए. ग्रामीणों को भी जागरूक किया जाना चाहिए कि वे ऐसे जलमग्न रास्तों का उपयोग न करें, चाहे सामने सड़क ही क्यों न दिख रही हो.

अज्ञानता और लापरवाही की विजय
दशहरा पर्व रावण पर राम की विजय का प्रतीक है. विजयादशमी का त्योहार इस गांव के लिए हमेशा एक त्रासदी के दिन के रूप में याद किया जाएगा. यहां राम की नहीं बल्कि अज्ञानता और लापरवाही की विजय हुई. 11 परिवारों के सपने, उम्मीदें और खुशियां एक झटके में डूब गईं. अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन मौतों से सबक लेगा या फिर अगली त्रासदी का इंतजार करेगा.

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