जंक फ़ूड और फ़िज़िकल इनएक्टिविटी की वजह से बच्चों में डायबिटीज़ हो रही है?

Junk Food & Physical Inactivity Caussing Diabetes In Kids: हाल के वर्षों में बच्चों की सेहत में ऐसे बदलाव आ रहे हैं जो पहले असंभव माने जाते थे. आजकल के बच्चों की जीवनशैली के कारण वे बीमारियां भी जल्दी सामने आ रही हैं जो पहले सिर्फ वयस्कों में देखी जाती थीं. बच्चों में डायबिटीज के बढ़ते मामले एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन गए हैं, जिस पर तुरंत ध्यान देना जरूरी है. मोटापा बढ़ना, ज्यादा शक्कर वाले खाने और कम शारीरिक गतिविधि के कारण बच्चों में टाइप 2 डायबिटीज जल्दी हो रही है. बच्चों में डायबिटीज दो तरह की होती है – टाइप 1 डायबिटीज, जिसे जुवेनाइल डायबिटीज भी कहते हैं, आमतौर पर छोटे बच्चों में होती है और इंसुलिन पर निर्भर रहती है, यह ज्यादातर आनुवांशिक या संक्रमण के कारण होती है.

डॉ. व्रजेंदु बी बी, कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक्स, फोर्टिस हॉस्पिटल, नगरभवी, बेंगलुरु बताते हैं, “टाइप 2 डायबिटीज, जिसे पहले वयस्कों की लाइफस्टाइल बीमारी माना जाता था, अब छोटे बच्चों में भी दिखने लगी है. कुछ मामलों में इसे ‘मॉडी’ कहा जाता है, यानी वयस्कों में होने वाली बीमारी अब बच्चों में भी आ रही है.” ज्यादा शरीर की चर्बी, खासकर पेट के आसपास, शरीर की इंसुलिन प्रतिक्रिया को बिगाड़ देती है, जिससे ब्लड शुगर कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है. इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण शरीर ग्लूकोज को ठीक से प्रोसेस नहीं करता और ब्लड शुगर बढ़ जाता है. शक्कर वाले ड्रिंक, रिफाइंड कार्ब्स, डीप-फ्राइड स्नैक्स और पैक्ड फूड खाने से ब्लड ग्लूकोज अचानक बढ़ता है और वजन भी बढ़ता है. डॉ. व्रजेंदु बी बी कहते हैं, “शारीरिक निष्क्रियता इस समस्या को और बढ़ा देती है.

आजकल बच्चे पढ़ाई और मनोरंजन के लिए स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताते हैं, जिससे बाहर खेलने और एक्सरसाइज के लिए समय नहीं मिलता.” शरीर को नियमित मूवमेंट चाहिए, जिससे मांसपेशियां ग्लूकोज को एनर्जी में बदलती हैं और इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ती है. अगर ऐसा नहीं होता तो मेटाबॉलिक समस्या जल्दी बढ़ती है. स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले बच्चों को नींद की समस्या होती है, जिससे हार्मोनल असंतुलन होता है और भूख का नियंत्रण बिगड़ जाता है, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है. शुरुआती चेतावनी के संकेत बहुत हल्के होते हैं और माता-पिता अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. “ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, अजीब थकान, बिना वजह वजन में बदलाव, गर्दन या बगल की त्वचा का काला पड़ना (जिसे मेडिकल भाषा में एकैंथोसिस निग्रिकन्स कहते हैं) और बार-बार संक्रमण होना, ये सब ब्लड शुगर बढ़ने के संकेत हैं,”

डॉ. व्रजेंदु बी बी बताते हैं. अगर समय पर डायबिटीज का पता और इलाज नहीं हुआ तो दिल, किडनी, नसों और आंखों में लंबे समय तक समस्या हो सकती है, जो किशोरावस्था में ही शुरू हो जाती है. रोकथाम घर से शुरू होनी चाहिए और स्कूल व समुदाय में भी इसे अपनाना चाहिए. साबुत अनाज, फल, सब्जियां और पर्याप्त प्रोटीन से बनी संतुलित डाइट लेनी चाहिए, प्रोसेस्ड और शक्कर वाले खाने की जगह.

रोज कम से कम 60 मिनट की शारीरिक गतिविधि, कम स्क्रीन टाइम, नियमित नींद और समय-समय पर हेल्थ चेकअप जरूरी हैं. बच्चों की लंबाई, वजन और BMI की नियमित जांच से जल्दी मोटापा और मेटाबॉलिक रिस्क का पता चल सकता है.बच्चों में डायबिटीज को रोकने के लिए जागरूकता, हाई रिस्क ग्रुप में जल्दी स्क्रीनिंग और लाइफस्टाइल में बदलाव जरूरी है. सही समय पर कदम उठाकर इस बीमारी को कंट्रोल किया जा सकता है, जिससे बच्चों की सेहत और जीवन की गुणवत्ता लंबे समय तक अच्छी बनी रहेगी.

Disclaimer : इस खबर में दी गई जानकारी और सलाह एक्सपर्ट्स से बातचीत पर आधारित है. यह सामान्य जानकारी है, पर्सनल सलाह नहीं. इसलिए किसी भी सलाह को अपनाने से पहले एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें. किसी भी नुकसान के लिए News-18 जिम्मेदार नहीं होगा.

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