अलीगढ़: आज के भागदौड़ भरे और डिजिटल युग में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां तेजी से बदल रही हैं. सबसे चौंकाने वाला बदलाव हमारी हड्डियों और जोड़ों की सेहत में देखने को मिल रहा है. जो जोड़ों का दर्द कभी बुढ़ापे की निशानी माना जाता था, वह अब 20 से 30 साल के युवाओं को अपनी चपेट में ले रहा है. खराब जीवनशैली, घंटों एक ही जगह बैठकर काम करना और असंतुलित खानपान ने इस समस्या को एक ‘साइलेंट हेल्थ इश्यू’ बना दिया है.
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के मेडिकल कॉलेज के प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक सर्जन प्रोफेसर फजल रहमान ने इस गंभीर विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए युवाओं को आगाह किया है.
युवाओं में बढ़ता ‘साइलेंट हेल्थ इश्यू’
प्रोफेसर फजल रहमान बताते हैं कि मेडिकल साइंस के पुराने आंकड़ों के अनुसार जोड़ों की समस्या उम्र से जुड़ी मानी जाती थी, लेकिन अब ओपीडी में आने वाले मरीजों में युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है. कई युवा बाहर से पूरी तरह फिट और स्वस्थ नजर आते हैं, लेकिन उनके जोड़ों के अंदर घर्षण और कमजोरी की शुरुआत हो चुकी होती है. यह एक ऐसी समस्या है जो धीरे-धीरे पनपती है और जब तक लक्षण गंभीर होते हैं, तब तक हड्डियां काफी कमजोर हो चुकी होती हैं. इसे ‘साइलेंट’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि शुरुआती थकान और हल्के दर्द को युवा अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.
सेडेंटरी लाइफस्टाइल: हड्डियों की सबसे बड़ी दुश्मन
आज के युवाओं में इस समस्या का सबसे बड़ा कारण उनकी ‘सेडेंटरी लाइफस्टाइल’ यानी गतिहीन जीवनशैली है. प्रोफेसर फजल के अनुसार, सूचना क्रांति के इस दौर में लोग घंटों लैपटॉप और मोबाइल पर बिताते हैं. शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण जोड़ों को मिलने वाला नेचुरल लुब्रिकेशन कम होने लगता है. इसके साथ ही ‘गलत पोश्चर’ एक बड़ी मुसीबत बनकर उभरा है. घंटों झुककर बैठना, गर्दन झुकाकर मोबाइल चलाना या लेटकर गैजेट्स का इस्तेमाल करना रीढ़ की हड्डी और जोड़ों पर अनुचित दबाव डालता है, जो भविष्य में गंभीर आर्थराइटिस का रूप ले सकता है.
पोषण की कमी और बढ़ता मोटापा
हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम, विटामिन-डी और प्रोटीन अनिवार्य तत्व हैं. प्रोफेसर फजल रहमान का कहना है कि आज की पीढ़ी फास्ट फूड और प्रोसेस्ड डाइट पर अधिक निर्भर है, जिससे शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता. विटामिन-डी की कमी अब एक महामारी की तरह फैल रही है क्योंकि धूप से संपर्क कम हो गया है. इसके अलावा, बढ़ता मोटापा भी एक प्रमुख कारण है. शरीर का हर एक किलो अतिरिक्त वजन घुटनों पर चार गुना दबाव डालता है. यह दबाव न केवल दर्द पैदा करता है बल्कि सूजन और यूरिक एसिड बढ़ने जैसी समस्याओं को भी आमंत्रित करता है, जो आगे चलकर डायबिटीज और हृदय रोगों का कारण बन सकता है.
चोट और ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा
युवाओं में जोड़ों की परेशानी के पीछे केवल जीवनशैली ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य मेडिकल कारण भी हैं. अक्सर युवा बिना सही ट्रेनिंग या वार्मअप के जिम या खेलों में अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं, जिससे लिगामेंट और कार्टिलेज इंजरी का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा, रूमेटॉइड आर्थराइटिस जैसी ऑटोइम्यून बीमारियां और थायरॉइड जैसी हार्मोनल समस्याएं भी जोड़ों को प्रभावित कर रही हैं. इन स्थितियों में शरीर का इम्यून सिस्टम ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला करने लगता है, जिससे जोड़ों में स्थाई जकड़न आ सकती है.
बचाव के कारगर उपाय और एक्सपर्ट की सलाह
प्रोफेसर फजल रहमान ने इस समस्या से निपटने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:
नियमित व्यायाम: दिनभर में कम से कम 30 से 45 मिनट शारीरिक गतिविधि अनिवार्य है. इसमें वॉक, योग और स्ट्रेचिंग को शामिल करना चाहिए.
संतुलित आहार: भोजन में दूध, दही, पनीर, हरी सब्जियां और प्रोटीन युक्त चीजों को शामिल करें ताकि कैल्शियम की पूर्ति हो सके.
व्यसनों से दूरी: धूम्रपान और गुटखा नसों और ऊतकों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं, इनका त्याग जरूरी है.
वजन नियंत्रण: जोड़ों पर पड़ने वाले बोझ को कम करने के लिए अपने वजन को बीएमआई (BMI) के अनुसार संतुलित रखें.
डॉक्टरी सलाह: दर्द होने पर खुद से पेनकिलर खाने की गलती न करें. 50 साल की उम्र के बाद नियमित चेकअप कराएं और यूरिक एसिड की जांच पर ध्यान दें.
उन्होंने कहा कि अंत में यही कहा जा सकता है कि युवाओं में जोड़ों की समस्या बढ़ रही है, लेकिन सही समय पर पहचान, बेहतर जीवनशैली और उचित उपचार से इसे रोका और नियंत्रित किया जा सकता है. स्वस्थ जोड़ ही एक सक्रिय और सफल जीवन की कुंजी हैं.