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झारखंड के जंगलों में मिलने वाला पारंपरिक खाद्य पदार्थ ‘तीखुर’ अब सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना जा रहा है. रांची के कृषि वैज्ञानिकों की रिसर्च में यह सामने आया है कि तीखुर पाउडर डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद है, जो न सिर्फ शरीर को इंस्टेंट एनर्जी देता है बल्कि गर्मी से जुड़ी समस्याओं में भी राहत पहुंचाता है. ग्लूटेन-फ्री और पोषक तत्वों से भरपूर यह देसी सुपरफूड अब प्राकृतिक इलाज और हेल्दी लाइफस्टाइल का अहम हिस्सा बनता जा रहा है. रिपोर्ट- शिखा श्रेया
झारखंड के जंगलों में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला ‘तीखुर’ अब केवल व्रत का भोजन नहीं, बल्कि डायबिटीज के मरीजों के लिए एक शक्तिशाली औषधि के रूप में उभर रहा है. रांची स्थित बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के कृषि वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में तीखुर पाउडर को मधुमेह और गर्मी से जुड़ी समस्याओं के लिए बेहद असरदार पाया है.
कृषि वैज्ञानिक प्रशांत के अनुसार, तीखुर का पाउडर पूरी तरह से ग्लूटेन-फ्री और फाइबर से भरपूर है. इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. डायबिटीज के मरीजों में अक्सर थकान और ऊर्जा की कमी देखी जाती है.
ऐसे में तीखुर का एक चम्मच ड्रिंक उन्हें ‘इंस्टेंट एनर्जी’ प्रदान करता है. इसमें मौजूद मैग्नीशियम, पोटेशियम, कैल्शियम और विटामिन-A व C शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं और गिरते इंसुलिन स्तर को संतुलित करने में मदद करते हैं.
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अक्सर शुगर के मरीजों को पैरों के तलवों में तेज जलन और गर्माहट महसूस होती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि तीखुर में नेचुरल कूलिंग एजेंट होते हैं. इसके पाउडर का पेस्ट बनाकर तलवों पर लगाने से जलन तुरंत शांत हो जाती है. इसके अलावा, यह पाउडर हड्डियों की कमजोरी को दूर करने में भी सहायक है, जो अक्सर लंबे समय तक डायबिटीज रहने के कारण होने लगती है.
तीखुर को ‘देसी एनर्जी ड्रिंक’ भी कहा जा रहा है. गर्मी के मौसम में एक गिलास पानी में एक चम्मच तीखुर पाउडर मिलाकर पीने से न केवल लू से बचाव होता है, बल्कि यह पेट की जलन और कब्ज जैसी समस्याओं को भी जड़ से खत्म करता है. यह शरीर के तापमान को नियंत्रित रखता है और शुगर के मरीजों में होने वाले अधिक पसीने या अचानक चक्कर आने जैसी समस्याओं का समाधान करता है.
इसका सेवन दो प्रमुख तरीकों से किया जा सकता है. एक गिलास पानी में एक चम्मच तीखुर पाउडर मिलाकर शरबत की तरह पिएं. दूसरा इसे पारंपरिक तरीके से दूध या पानी के साथ पकाकर हलवे के रूप में भी खाया जा सकता है. रांची और पलामू के जंगलों में बहुतायत में मिलने वाला यह सफेद पाउडर अब आधुनिक चिकित्सा और खान-पान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने की राह पर है.