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Japan Snowfall News: नासा के सैटेलाइट ने जापान में 21वीं सदी की सबसे भारी बर्फबारी को कैद किया है. होक्काइडो और ओमोरी में रिकॉर्ड तोड़ हिमपात की वजह से दर्जनों मौतें हुई हैं और ट्रांसपोर्ट पूरी तरह ठप हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि बदलता मौसम इस खतरनाक स्थिति के लिए जिम्मेदार है.
जापान में जमी बर्फ की 2 मीटर मोटी परत. (Photo : NASA)
टोक्यो: नासा (NASA) के सैटेलाइट ने जापान की एक ऐसी तस्वीर कैद की है, जिसे देखकर दुनिया हैरान है. यह तस्वीर 21वीं सदी की सबसे भीषण बर्फबारी की गवाही दे रही है. इस बर्फीले तूफान ने जापान के उत्तरी इलाकों को पूरी तरह से सफेद चादर में ढंक दिया है. 5 फरवरी 2026 को नासा के टेरा सैटेलाइट पर लगे मोडिस (MODIS) इंस्ट्रूमेंट ने होक्काइडो द्वीप की यह फोटो ली है. तस्वीर में पूरा इलाका एक ‘व्हाइटआउट’ की स्थिति में नजर आ रहा है, जहां जमीन और आसमान का फर्क करना मुश्किल हो गया है.
होक्काइडो में क्यों टूटा रिकॉर्ड?
होक्काइडो का साप्पोरो शहर अपनी भारी बर्फबारी और स्नो फेस्टिवल के लिए मशहूर है. यहां साल में करीब 140 दिन बर्फ गिरती है और औसतन 6 मीटर तक बर्फ जमा होती है. इस बार स्थिति सामान्य से बहुत ज्यादा खराब रही. साइबेरिया से आने वाली ठंडी हवाएं जब जापान के गर्म सागर के ऊपर से गुजरती हैं, तो ‘सी-इफेक्ट’ की वजह से भारी हिमपात होता है. जनवरी और फरवरी के महीनों में ओमोरी जैसे इलाकों में 2 मीटर से ज्यादा बर्फ जमा हो गई, जिसने जनजीवन को पूरी तरह से ठप कर दिया है.
21वीं सदी की सबसे बड़ी बर्फबारी में दफन हुआ जापान! (Photo : Reuters)
इस कुदरती कहर ने जापान में भारी तबाही मचाई है. एयरपोर्ट्स बंद करने पड़े और ट्रेनों के पहिए थम गए. सड़कों पर गाड़ियां घंटों तक फंसी रहीं. स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि मकानों की छतों से बर्फ हटाने के लिए सेना (सैनिकों) को बुलाना पड़ा. जापान की फायर एंड डिजास्टर मैनेजमेंट एजेंसी के मुताबिक, इस बर्फबारी की वजह से दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं. पश्चिमी जापान में भी इसका असर दिखा, जहां बुलेट ट्रेनों की रफ्तार थम गई और नेशनल इलेक्शन के दौरान पोलिंग स्टेशनों को समय से पहले बंद करना पड़ा.
सैटेलाइट तस्वीर में क्या दिखा?
नासा की इस इमेज में होक्काइडो के ज्वालामुखी वाले हिस्से साफ नजर आ रहे हैं. यहां 31 एक्टिव ज्वालामुखी हैं और पांच बड़ी झीलें हैं, जो पुराने विस्फोटों से बनी हैं. उत्तर में ओखोत्स्क सागर में समुद्री बर्फ (सी आइस) के तैरते हुए टुकड़े भी दिखाई दे रहे हैं. हालांकि, वैज्ञानिकों ने एक चिंताजनक बात भी कही है. डेटा बताता है कि 1970 के दशक से हर दशक में समुद्री बर्फ में 3.4% की कमी आई है. यानी एक तरफ भीषण बर्फबारी हो रही है, तो दूसरी तरफ ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्री बर्फ पिघल रही है.
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दीपक वर्मा (Deepak Verma) एक पत्रकार हैं जो मुख्य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों और समसामयिक विषयों से जुडी विस्तृत रिपोर्ट्स लिखते हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़…और पढ़ें
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