ईरान-इजरायल युद्ध: कुछ देशों की नहीं, पूरे विश्व में तेल, डॉलर और ग्लोबल शक्ति बनने की जंग

ईरान के खिलाफ जंग और उनके सुप्रीम लीडर की मौत सिर्फ एक सैन्य घटना नहीं है; यह वेस्ट एशिया, ग्लोबल एनर्जी मार्केट और इंटरनेशनल फाइनेंस सिस्टम के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है. अमेरिका और इज़राइल इसे सिक्योरिटी और न्यूक्लियर थ्रेट से जोड़ते हैं, लेकिन जब हम एनर्जी डेटा, क़र्ज़ के आंकड़े और करेंसी ट्रेंड्स को साथ रखकर देखते हैं, तो तस्वीर कहीं बड़ी नजर आती है.

वेनज़ुएला और ईरान: ऊर्जा की महाशक्ति

सबसे पहले आंकड़ों की बात. वेनज़ुएला के पास लगभग 302 बिलियन बैरल्स प्रूवन ऑयल रिज़र्व्स हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक हैं. वहीं ईरान के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नैचुरल गैस रिज़र्व है. विभिन्न इंटरनेशनल एनर्जी एस्टीमेट्स (आकलन) के अनुसार, उसके पास लगभग 1,200 ट्रिलियन क्यूबिक फीट (लगभग 1.2 क्वाड्रिलियन क्यूबिक फीट) गैस भंडार है.

ऐसे ऊर्जा-समृद्ध देश यदि डॉलर के बाहर ऑयल और गैस बेचने लगें, तो इसका असर सीधे ग्लोबल करेंसी स्ट्रक्चर पर पड़ता है. ईरान और वेनेज़ुएला दोनों पर लंबे समय से प्रतिबंध लगे हुए हैं और दोनों ने अल्टरनेटिव पेमेंट मेकैनिज़्म्स की कोशिश की है.

यूएस: सबसे बड़ा कर्जदार, लेकिन एनर्जी एक्सपोर्टर

एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अमेरिका पर इस समय लगभग 35 से 40 ट्रिलियन डॉलर का नेशनल डेट है, जो उसकी जीडीपी से भी काफी अधिक है. दूसरी ओर, शेल गैस रिवोल्यूशन के बाद अमेरिका एनर्जी सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देख चुका है.

हाइड्रॉलिक फ्रैक्चरिंग और हॉरिज़ॉन्टल ड्रिलिंग के कारण अमेरिका, जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा एनर्जी इम्पोर्टर था, अब नेट एनर्जी एक्सपोर्टर बन चुका है. यूएस एलएनजी और क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट लगातार बढ़े हैं.

लेकिन यहां एक आर्थिक सच भी है, यूएस शेल प्रोडक्शन का कॉस्ट कई कन्वेंशनल ऑयल प्रोड्यूसिंग देशों (जैसे मिडिल ईस्ट) से अधिक है. अगर ग्लोबल ऑयल और गैस प्राइसेज़ कम रहें, तो यूएस शेल कंपनियों पर दबाव बढ़ता है. लेकिन अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो यूएस एनर्जी कंपनियों को सीधा लाभ होता है, एक्सपोर्ट रेवेन्यू बढ़ता है और नए मार्केट्स की तलाश आसान हो जाती है. इसलिए ऊँची एनर्जी प्राइसेज़ अमेरिका के एनर्जी सेक्टर के लिए लाभकारी हो सकती हैं.

ऊँची कीमतें और यूएस डेट का गणित

अब डेट और डॉलर के बीच संबंध समझिए. अगर तेल और गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो ग्लोबल ऑयल ट्रेड में डॉलर की डिमांड बढ़ती है, डॉलर मजबूत होता है और यूएस ट्रेज़री बॉन्ड्स की डिमांड भी बढ़ जाती है. इससे अमेरिका को कम इंटरेस्ट रेट पर नया डेट मिल सकता है.

जब डॉलर की ग्लोबल डिमांड मजबूत रहती है, तो यूएस को डेट रिस्ट्रक्चरिंग आसान हो जाती है, पुराने कर्ज का रिफाइनेंसिंग सस्ता पड़ता है और फिस्कल प्रेशर कुछ हद तक कम होता है. जो देश यूएस के फाइनेंशियल और कैपिटल मार्केट्स से पैसा निकालना चाहते हैं, वे भी ग्लोबल अनसर्टेनिटी के दौर में यूएस मार्केट को “सेफ हेवन” मानते हैं. इससे कैपिटल आउटफ्लो रुक सकता है.

डॉलर का घटता शेयर: बढ़ती चिंता

इंटरनेशनल ट्रेड में डॉलर का शेयर धीरे-धीरे घट रहा है. ब्रिक्स देश, चाइना-रूस ट्रेड और इंडिया-रूस सेटलमेंट,इन सब में लोकल करेंसी का इस्तेमाल बढ़ रहा है. यह ट्रेंड डी-डॉलराइजेशन की ओर इशारा करता है.

अमेरिका के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि उसका ग्लोबल फाइनेंशियल इन्फ्लुएंस काफी हद तक डॉलर डॉमिनेंस पर टिका है.

ट्रेड वॉर, टैरिफ वॉर और पुराने सहयोगी

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौर में ट्रेड वॉर, टैरिफ वॉर और करेंसी टेंशन ने ग्लोबल सप्लाई चेन को हिला दिया. इसका असर यह हुआ कि यूके, कनाडा और ईयू जैसे पुराने सहयोगी देश भी अल्टरनेटिव ट्रेड एग्रीमेंट्स की ओर बढ़ने लगे. दूसरे देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स साइन होने लगे और यूएस के ट्रेडिशनल इकोनॉमिक अलायंस में दरारें दिखने लगीं.

अगर पुराने सहयोगी देश अपने विकल्प बढ़ाते हैं, तो यूएस की लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक लीवरेज कम हो सकती है.

एनर्जी कंट्रोल और स्ट्रैटेजिक प्रेशर

अगर एनर्जी-रिच देश डॉलर से बाहर ट्रेड करें और साथ ही यूएस पॉलिसी को चैलेंज करें, तो वे स्ट्रैटेजिक प्रेशर का सामना कर सकते हैं.

ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद रीजनल इंस्टेबिलिटी बढ़ेगी, ऑयल सप्लाई रिस्क बढ़ेगा और प्राइसेज़ ऊपर जा सकती हैं. यही वह बिंदु है जहाँ एनर्जी, डेट और डॉलर एक साथ जुड़ते दिखाई देते हैं.

युद्ध की परतों के पीछे की आर्थिक सच्चाई

यह कहना आसान होगा कि ईरान पर हमला केवल सिक्योरिटी इश्यू है. लेकिन जब हम 302 बिलियन बैरल्स वेनेज़ुएला का रिज़र्व, 1,200 ट्रिलियन क्यूबिक फीट ईरान का गैस रिज़र्व, 35-40 ट्रिलियन डॉलर यूएस डेट, शेल एनर्जी का उच्च प्रोडक्शन कॉस्ट और डॉलर का घटता ग्लोबल शेयर,इन सबको साथ रखते हैं, तो सवाल उठता है:

क्या यह केवल जियोपॉलिटिकल कॉन्फ्लिक्ट है, या ग्लोबल करेंसी डॉमिनेंस और एनर्जी प्राइसिंग पावर की भी जंग है?

आज की लड़ाई केवल मिसाइल और बॉर्डर्स की नहीं है. यह फाइट है, पेट्रो-डॉलर सिस्टम बनाम मल्टी-करेंसी ट्रेड, एनर्जी प्राइसिंग कंट्रोल बनाम प्रोडक्शन एडवांटेज, और डेट प्रेशर बनाम फाइनेंशियल डॉमिनेंस. ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत एक हेडलाइन जरूर है, लेकिन उसके पीछे चल रही आर्थिक जंग शायद इतिहास का बड़ा अध्याय लिख रही है.

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