नई दिल्ली. कहते हैं किस्मत मेहनत का साथ तब देती है जब इंसान हार मानने से इनकार कर दे. बेंगलुरु के रहने वाले रमेश बाबू की कहानी कुछ ऐसी ही है. कभी दो वक्त की रोटी भी रमेश को मुश्किल से नसीब होती थी, वहीं आज वे करोड़पति हैं और 400 कारों के मालिक हैं. उनके बेड़े में रॉल्स रोयलस, बीएमडब्ल्यू और जगुआर जैसी 120 लग्जरी कारें भी हैं. रमेश बाबू आज भारत के सबसे अमीर नाई हैं. करोड़पति होने के बाद भी उन्होंने अपने सैलून पर काम करना नहीं छोड़ा है. वे अब भी लोगों के बाल काटते नजर आ जाते हैं.
अखबार बांटे, घर-घर बेचा दूध
पिता की मौत के बाद मां जी-तोड़ मेहनत तो कर रही थी, लेकिन घर का गुजारा बहुत मुश्किल से चलता था. रमेश थोड़े बड़े हुए तो उन्होंने भी घर की जिम्मेदारियां उठानी शुरू कर दी. वे सुबह तड़के उठकर घर-घर दूध की सप्लाई करते और सड़क पर अखबार बेचा करते. यह सब करते हुए भी उन्होंने पढाई नहीं छोड़ी और अपनी SSLC पूरी की. इसके बाद उन्होंने शाम को इवनिंग कॉलेज में दाखिला ले लिया.
पिता की संभाली दुकान
रमेश के पिता अपने पीछे ब्रिगेड रोड पर एक छोटा-सा सैलून छोड़ गए थे, जिसे चाचा चलाते थे. वे रोज़ाना पांच रुपये घर भेजते थे. लेकिन कुछ साल बाद चाचा ने रमेश के परिवार को पांच रुपये देने भी बदं कर दिए. यह बात रमेश को खूब अखरी. 14 साल की उम्र में रमेश बाबू ने चाचा से अपना सैलून वापस ले लिया. उन्होंने उसे रेनोवेट किया और दो कारीगर रखकर खुद उसे संभालने लगे. समस्या यह थी कि कारीगर टाइम पर नहीं आते थे. इससे उनका धंधा खराब हो रहा था. रमेश बाबू को बाल काटने नहीं आते थे. लेकिन, एक दिन एक ग्राहक ने जिद करके रमेश बाबू से अपने बाल कटवाए. तब रमेश बाबू को अपने बाल काटने के हुनर का पता चला और वे मन लगाकर काम में जुट गए.
रमेश सुबह 6 बजे से शाम 5 बजे तक सैलून में काम. फिर भागकर कॉलेज जाते. वे रोजाना करीब करीब 16 घंटे मेहनत करते. बिना शिकायत, बिना किसी रुकावट. धीरे-धीरे उनकी कैंची और मेहनत दोनों का नाम होने लगा. रमेश बाबू के सैलून का काम अच्छा चल पड़ा. उनके पास खूब ग्राहक हो गए. उन्होंने सैलून की कमाई से बचत कर कुछ पैसे जोड़ लिए.
किस्तों पर ली कार ने बदली जीवन की दिशा
1993 एक मारुति ओम्नी कार किस्तों पर ले ली. लेकिन, कुछ समय बाद पैसों की तंगी की वजह से वे किस्त नहीं भर पाए. रमेश की मां जिस घर में काम करती थी, उस घर की मालकिन ने रमेश को कार को किराये पर चलाने की सलाह दी. रमेश के लिए ये सलाह वरदान बन गई. उन्होंने कार किराये पर चलानी शुरू की तो पता चला कि बेंगलुरु में रेंटल कार बिजनेस में अपार संभावनाएं हैं.
अब बेड़े में 400 कारें
रमेश बाबू ने कुछ समय तक स्वयं कार चलाने के बाद कुछ बड़ा करने की सोची. वे पूरी तरह कार रेंटल बिजनेस में उतरना चाहते थे. उन्हें पता चल गया था कि बेंगलुरु में इस बिजनेस की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन उन्हें कुछ हटकर करना होगा. उन्होंने धीरे-धीरे अपनी कारों की संख्या बढ़ानी शुरू कर दी. जब बिजनेस अच्छा चल पड़ा तो उन्होंने लग्जरी कारें खरीदना शुरू किया. अब उनके पास 400 कारें हैं, जिनमें से 120 लग्जरी कारें हैं.
आज कार रेंटल बिजनेस के रमेश बाबू बड़े खिलाड़ी हैं. वे आज रॉल्स रॉयस, मर्सिडिज़ बेंज़, BMW, Audi, जैगुआर जैसी लग्जरी गाड़ियां रेंट पर देते हैं. वो कहते हैं कि आप किसी भी लग्जरी ब्रांड के कारों का नाम लीजिए, वो उनके पास है. रमेश बाबू ने करोड़ों का बिजनेस होने के बाद भी अपने सैलून पर कटिंग करना नहीं छोड़ा है.
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