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गुजिया उत्तर भारत की पारंपरिक मिठाई है, जो होली पर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, दिल्ली में खास बनती है.
गुजिया उत्तर भारत की एक पारंपरिक मिठाई है, जो खास तौर पर होली पर बनाई जाती है. यह मुख्य रूप से निम्न प्रांतों की पहचान मानी जाती है.
उत्तर प्रदेश – होली पर गुजिया बनाना यहां की सबसे पकी-पकी परंपरा है. लगभग हर घर में तिल-खोपरा या मावा की गुजिया बनती है.
राजस्थान – यहां इसे “घेवर, दाल-बाटी” जितना ही महत्वपूर्ण माना जाता है. राजस्थानी गुजिया में सूखे मेवों की मात्रा अधिक होती है.
मध्य प्रदेश – खासकर मालवा और बुंदेलखंड क्षेत्र में गुजिया होली की ‘मुख्य मिठाई’ मानी जाती है.
बिहार – बिहार में इसे पिरकीया या करंजी के रूप में जाना जाता है, और होली पर यह अनिवार्य मिठाई है.
उत्तराखंड – कुमाऊं और गढ़वाल दोनों में मावा और नारियल की गुजिया बनती है.
झारखंड और छत्तीसगढ़ – यहां भी इसे होली का खास व्यंजन माना जाता है.
हरियाणा और दिल्ली – इन राज्यों में उत्तर भारतीय प्रभाव के कारण गुजिया बेहद लोकप्रिय है.
दक्षिण भारत में पारंपरिक रूप से गुजिया नहीं बनाई जाती, लेकिन अब उत्तर भारतीय आबादी बढ़ने के कारण बड़े शहरों, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, में भी होली पर गुजिया आम होती जा रही है.
होली पर गुजिया बनाने का कारण क्या है?
1. कृषि और मौसम से जुड़ा संबंध
होली का समय रबी फसल कटने और घर में नई पैदावार आने का होता है. इसी समय दूध, मावा और सूखे मेवे भरपूर मात्रा में उपलब्ध रहते थे. इसलिए त्योहार पर समृद्धि का प्रतीक मावा और मेवों वाली मिठाई बनाना शुभ माना गया.
2. वैदिक परंपरा, नए मौसम का स्वागत
गुजिया का आधा चंद्राकार आकार ‘पूर्णता’ और ‘समृद्धि’ का प्रतीक है. होली नए मौसम की शुरुआत (बसंत) का उत्सव है, इसलिए मीठे व्यंजन बनाने की परंपरा बनी.
3. घरों में बड़े पैमाने पर बनाना आसान
गुजिया ऐसा व्यंजन है जिसे बड़ी मात्रा में बनाना आसान है और यह आसानी से कई दिनों तक सुरक्षित रहती है. होली के समय जब रिश्तेदार और मेहमानों का आना-जाना अधिक होता था, तो गुजिया सबसे उपयुक्त मिठाई मानी गई.
4. सामूहिक उत्सव की परंपरा
होली सामूहिक उत्सव है. पुराने समय में महिलाएं मोहल्ले में इकट्ठी होकर गुजिया बनाती थीं. इस कारण यह मिठाई सामाजिक मेल-मिलाप का भी प्रतीक बन गई.
5. पौराणिक व सांस्कृतिक प्रभाव
कहा जाता है कि वैष्णव परंपरा में बसंतोत्सव के समय दूध-मावा से बनी मिठाइयां कृष्ण को अर्पित की जाती थीं. वही परंपरा बाद में गुजिया के रूप में लोकप्रिय हुई.
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