भोपाल/ शहडोल. मध्य प्रदेश, जिसे देश का टाइगर स्टेट कहा जाता है, एक बार फिर बाघों की अस्वाभाविक मौतों को लेकर सवालों के घेरे में है. शहडोल जिले में हाल ही में दो बाघों की इलेक्ट्रोक्यूशन से मौत के बाद पूरे वन तंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. 1 जनवरी 2026 से अब तक महज 34 दिनों में राज्य में 9 बाघों की मौत हो चुकी है, जिनमें से अधिकांश मौतें बिजली के करंट, सड़क और रेल हादसों तथा अन्य मानवीय कारणों से जुड़ी बताई जा रही हैं. ये आंकड़े न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि बाघ संरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की कमजोर कड़ियों को भी उजागर करते हैं.
2026 की शुरुआत में मौतों का खौफनाक सिलसिला
2026 की शुरुआत से ही मध्य प्रदेश में बाघों की मौतों का सिलसिला तेज हो गया. 1 जनवरी से 26 जनवरी के बीच राज्य में 7 बाघों की मौत दर्ज की गई. इनमें से कई मामलों में मानवीय हस्तक्षेप सामने आया. NTCA के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 में पूरे देश में 19 बाघों की मौत हुई, जिनमें बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश से जुड़ा रहा. यह संकेत करता है कि बाघों की बढ़ती संख्या के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष भी तेजी से बढ़ रहा है.
शहडोल में दो बाघों की इलेक्ट्रोक्यूशन से मौत
1 और 2 फरवरी 2026 को शहडोल के उत्तर वन मंडल के जयसिंहनगर क्षेत्र के करपा बीट में एक नर और एक मादा बाघ की लाशें मिलीं. दोनों शव कृषि भूमि में करीब 100 मीटर की दूरी पर पाए गए. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण बिजली का करंट बताया गया. प्रारंभिक जांच में सामने आया कि किसानों ने फसलों की सुरक्षा के लिए अवैध रूप से बिजली के तार लगाए थे. वन विभाग ने तार जब्त कर लिए हैं और दोषियों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई की तैयारी की जा रही है.
2025 बना बाघ मौतों का रिकॉर्ड साल
पिछला साल यानी 2025 मध्य प्रदेश के लिए बाघ मौतों के लिहाज से अब तक का सबसे भयावह साल रहा. पूरे वर्ष में 54 से 56 बाघों की मौत दर्ज की गई. यह आंकड़ा प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के बाद सबसे अधिक माना जा रहा है. इनमें से आधे से ज्यादा मामले अस्वाभाविक कारणों से जुड़े थे. NTCA के अनुसार फिलहाल मध्य प्रदेश में करीब 785 बाघ हैं, जो देश की कुल बाघ आबादी का लगभग 25 प्रतिशत है.
वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे की याचिका में बाघों की मौतों को पोचिंग, तस्करी और प्रशासनिक लापरवाही से जोड़ा गया है. याचिका में यह भी आरोप है कि बाघों के अंगों की तस्करी नेपाल और चीन तक हो रही है. हाई कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए सभी संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है. 11 फरवरी की सुनवाई में बाघ संरक्षण से जुड़े बड़े फैसलों की संभावना जताई जा रही है. हाई कोर्ट की आगामी सुनवाई से वन प्रशासन में बड़े सुधार और जवाबदेही तय होने की उम्मीद है. विशेषज्ञ सोलर फेंसिंग, बेहतर पेट्रोलिंग और किसानों को मुआवजा व जागरूकता कार्यक्रमों की जरूरत बता रहे हैं.
बाघ संरक्षण पर उठते सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों के आसपास बढ़ता मानवीय दबाव, अवैध बिजली फेंसिंग और कमजोर निगरानी तंत्र बाघों की मौतों की बड़ी वजह बन रहा है. रतापानी जैसे क्षेत्रों में रेल पटरियों पर हुई मौतें भी इसी खतरे की ओर इशारा करती हैं. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो टाइगर स्टेट की पहचान पर भी संकट खड़ा हो सकता है.
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