पन्ना में भूरा आदिवासी को वापस मिली अपनी जमीन: बेटों ने मृत बताकर बेच दी थी; 11 साल बाद प्रशासन ने वापस लौटाई – Panna News

पन्ना जिले के जनवार गांव में रहने वाले भूरा गोंड़ आदिवासी को आखिरकार 11 साल बाद अपनी जमीन वापस मिल गई है। प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार के हस्तक्षेप के बाद प्रशासन ने मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए राजस्व रिकॉर्ड में सुधार किया और बेटों द्वारा ब

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मंत्री के दौरे में सामने आया मामला

यह मामला 17 अगस्त 2025 को उस समय सामने आया, जब पन्ना जिले के प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार जनवार गांव के दौरे पर पहुंचे थे। इस दौरान करीब 80 वर्षीय भूरा गोंड़ मंत्री के सामने पहुंचे और बताया कि वह जीवित हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है। साथ ही उनके बेटों ने उनकी जमीन अपने नाम करा ली और उसका कुछ हिस्सा बेच भी दिया।

राजस्व विभाग ने की जांच

मंत्री के निर्देश पर कलेक्टर पन्ना ने मामले को गंभीरता से लिया। इसके बाद अनुविभागीय अधिकारी राजस्व (एसडीओ) पन्ना द्वारा ग्राम जनवार स्थित भूरा पिता घिनुवा गोंड़ की भूमि खसरा नंबर 92 रकबा 0.170 हेक्टेयर और खसरा नंबर 223/18 रकबा 2.020 हेक्टेयर की जांच शुरू की गई। जांच के बाद विधिवत प्रकरण दर्ज किया गया।

एसडीओ का आदेश, जमीन फिर से भूरा के नाम

अनुविभागीय अधिकारी राजस्व पन्ना संजय नागवंशी ने प्रकरण क्रमांक 0089/अपील/2025-26 में 15 दिसंबर 2025 को आदेश पारित किया। आदेश में भूरा के पुत्र रामेश्वर और रूपलाल द्वारा वर्ष 2012 में अपने नाम कराई गई जमीन को निरस्त करते हुए उसे पुनः भूरा आदिवासी के नाम दर्ज करने के निर्देश दिए गए।

मौके पर सौंपे दस्तावेज

राजस्व विभाग द्वारा खसरा, खतौनी और आदेश की प्रतियां जनवार गांव में ही भूरा आदिवासी को सौंपी गईं। इस दौरान उनकी सेवा कर रही परिजन शीला पत्नी शिवधनी आदिवासी भी मौजूद रहीं। तहसीलदार पन्ना को निर्देश दिए गए हैं कि राजस्व निरीक्षक और पटवारियों के माध्यम से भूमि का सीमांकन कर यह सुनिश्चित किया जाए कि भूरा के कब्जे में कोई बाधा न आए।

कागजों में मृत, हकीकत में जिंदा

दरअसल, भूरा आदिवासी को करीब 14 साल पहले सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया था। इसके बाद पटवारी और तहसील स्तर पर फौती और नामांतरण की प्रक्रिया पूरी कर दी गई। जमीन उनके बेटों के नाम चढ़ा दी गई और बाद में उसका एक हिस्सा बेच भी दिया गया। गांव में दबंगों की परेशानी के कारण भूरा रोजी-रोटी के लिए कटनी चला गया था और लंबे समय तक गांव नहीं आ सका।

न्याय के लिए 11 साल तक भटकते रहे

जब भूरा गांव लौटा तो उसे पता चला कि वह सरकारी कागजों में “मर चुका” है। इसके बाद वह 11 साल तक अपने जिंदा होने का प्रमाण लेकर शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के चक्कर काटता रहा। आखिरकार मंत्री के सामने अपनी पीड़ा रखने के बाद प्रशासन को अपनी गलती का एहसास हुआ।

अन्य योजनाओं का लाभ भी मिलेगा

एसडीओ पन्ना ने विभिन्न विभागों को पत्र लिखकर निर्देश दिए हैं कि भूरा आदिवासी को शासन की जनहितैषी योजनाओं का पात्रता अनुसार लाभ दिलाया जाए। प्रशासनिक कार्रवाई के बाद अब भूरा को न सिर्फ अपनी जमीन वापस मिली है, बल्कि न्याय मिलने की उम्मीद भी जगी है।

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